बिना पर्यावरण क्लीयरेंस हर हफ्ते खप रहा 40 से 50 लाख का माल, जिम्मेदार विभाग गहरी नींद में
गाड़ी जा रही उत्तर प्रदेश और पर्यावरण दस्तावेज पश्चिम बंगाल का; पुलिस को गुमराह कर राज्य पार कर रहा सिंडिकेट
कैंसर जैसी घातक बीमारियों को दावत दे रहा है असुरक्षित परिवहन, एसईसीएल और एनटीपीसी की बैटरियों में घालमेल की आशंका
कोरबा। जिला मुख्यालय और आसपास के क्षेत्रों में अवैध कबाड़ और डीजल चोरी के समानांतर अब ‘बैटरी स्क्रैप’ का एक बड़ा काला कारोबार धड़ल्ले से पैर पसार चुका है। बिना किसी वैध परमिट, पर्यावरण क्लीयरेंस और अनिवार्य लाइसेंस के, कोरबा से हर महीने करोड़ों रुपये का अवैध बैटरी स्क्रैप बाहरी राज्यों में भेजा जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण की दुहाई देने वाला प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CECB) और स्थानीय पुलिस इस गंभीर व जानलेवा अवैध कारोबार से पूरी तरह अनजान बने हुए हैं।
हर हफ्ते 200 टन स्क्रैप पार, सिर्फ जीएसटी बिल का सहारा
पुष्ट सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अकेले कोरबा जिले से हर हफ्ते लगभग 200 टन अवैध बैटरी स्क्रैप का परिवहन दूसरे राज्यों में किया जा रहा है। बिना वैध अनुमति और दस्तावेजों के निकलने वाली प्रति गाड़ी में 30 से 50 लाख रुपये का माल लोड होता है। इस अवैध सिंडिकेट से जुड़े कारोबारी नियमों को ताक पर रखकर, केवल एक जीएसटी (GST) बिल थमाकर सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि इस खेल में एसईसीएल (SECL), एनटीपीसी (NTPC) व अन्य सार्वजनिक उपक्रमों से निकलने वाली कंडोम बैटरियों का भी बड़े पैमाने पर घालमेल किया जा रहा है।
खेल निराला: गाड़ी जा रही यूपी, क्लीयरेंस सर्टिफिकेट बंगाल का!
इस अवैध धंधे की कड़वी सच्चाई यह है कि जब कोरबा से अवैध बैटरी स्क्रैप की गाड़ी उत्तर प्रदेश (UP) के लिए रवाना होती है, तो उसके पास पर्यावरण संबंधी क्लीयरेंस दस्तावेज पश्चिम बंगाल का होता है। रास्ते में किसी भी तरह की जांच से बचने के लिए शातिर कारोबारी केवल जीएसटी बिल का सहारा लेते हैं। चूंकि परिवहन और पुलिस विभाग के जमीनी अमले को बैटरी स्क्रैप के कड़े नियमों और पर्यावरण मानकों की तकनीकी जानकारी नहीं होती, इसलिए यह गाड़ियां बिना किसी बाधा के राज्य की सीमाएं पार कर जाती हैं।
नियमों की धज्जियां: रायपुर मुख्यालय की अनुमति अनिवार्य, पर ले कौन रहा?
नियमों के जानकार बताते हैं कि बैटरी स्क्रैप के परिवहन के लिए छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (प्रदूषण नियंत्रण विभाग) के रायपुर स्थित मुख्य कार्यालय से विशेष लाइसेंस और रूट परमिट जारी होना अनिवार्य है। इसके साथ ही, बैटरी बेचने वाले व्यापारी और उसे खरीदने वाले कबाड़ी, दोनों के पास पर्यावरण विभाग की वैध ‘अथॉरिटी’ (प्राधिकरण पत्र) होनी चाहिए। लेकिन कोरबा में इस नियम का दूर-दूर तक पालन नहीं हो रहा है, जिससे हर साल सरकार को लाखों रुपये के टैक्स और पर्यावरण उपकर (Cess) का चूना लग रहा है।
तिरपाल के नीचे छिपा है कैंसर का खतरा
बैटरी स्क्रैप का अपशिष्ट (लेड और एसिड) एक अत्यंत जहरीला और घातक रासायनिक पदार्थ है, जिसके असुरक्षित रिसाव से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां फैलने का खतरा रहता है। नियमानुसार, इस खतरनाक कचरे का परिवहन पूरी तरह से सील और बंद वाहनों में होना चाहिए। इसके विपरीत, कोरबा में नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए खुली गाड़ियों में सिर्फ एक तिरपाल ढंककर इस जहरीले स्क्रैप को सड़कों पर दौड़ाया जा रहा है, जो आम जनता की सेहत के साथ बड़ा खिलवाड़ है।
कड़े एक्शन की दरकार
स्थानीय सूत्रों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि राज्य में इस तरह के फर्जी और अवैध कारोबार पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। छत्तीसगढ़ शासन को इस मामले का संज्ञान लेते हुए पर्यावरण विभाग, जीएसटी विंग और पुलिस प्रशासन को एक संयुक्त जांच दल बनाकर इस रैकेट के सरगनाओं के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश जारी करने की जरूरत है।

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