कोरबा में जमे मोहनीश! न सूरजपुर गए-न सक्ती जा रहे, डिप्टी CM के प्रभार जिले में शासन का आदेश निष्प्रभावी

फरवरी में जारी ‘तत्काल प्रभावशील’ ट्रांसफर आदेश पर 4 माह बाद भी नहीं हुई कार्यमुक्ति

प्रशासनिक ढर्रे पर गंभीर सवाल: आखिर किसके रसूख के आगे बौने साबित हो रहे सरकारी निर्देश?

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कोरबा। छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री और कोरबा जिले के प्रभारी मंत्री अरुण साव के प्रभार वाले जिले में शासन के आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मामला पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के एक अफसर से जुड़ा है, जहां ट्रांसफर के चार महीने बाद भी अधिकारी अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के नाम से अवर सचिव वीरेंद्र कुमार जायसवाल द्वारा 20 फरवरी 2026 को एक तबादला आदेश जारी किया गया था। इस आदेश में स्पष्ट लिखा था कि यह ‘तत्काल प्रभावशील’ होगा और अधिकारी को 10 दिनों के भीतर कार्यमुक्त (Relieve) होना पड़ेगा, ताकि अगले महीने का वेतन नई पदस्थापना से मिल सके। लेकिन जनपद सीईओ मोहनीश आनंद देवांगन पर इस कड़क आदेश का कोई असर नहीं हुआ और वे आज भी कोरबा में ही जमे हुए हैं।

तबादलों का खेल: सूरजपुर से सक्ती हुआ ट्रांसफर, पर नहीं हिले देवांगन

इस पूरे मामले में प्रशासनिक लापरवाही और अफसर की मनमानी की क्रोनोलॉजी बेहद दिलचस्प है:

पहला ट्रांसफर (करतला से सूरजपुर): पूर्व में करतला जनपद पंचायत के सीईओ रहे मोहनीश आनंद देवांगन का तबादला ‘सहायक परियोजना अधिकारी’ के रूप में सूरजपुर किया गया था। लेकिन उन्हें सूरजपुर के लिए रिलीव करने के बजाय जिला पंचायत कोरबा में ही अटैच कर दिया गया।

पाली जनपद में ‘जुगाड़’ की एंट्री: 3 फरवरी 2026 को पाली जनपद सीईओ भूपेंद्र कुमार सोनवानी के अनाधिकृत रूप से गायब रहने के कारण, तत्कालीन कलेक्टर ने व्यवस्था के तहत मोहनीश देवांगन को पाली जनपद का प्रभार सौंप दिया।

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दूसरा ट्रांसफर (सूरजपुर से सक्ती): इसके ठीक बाद, 20 फरवरी 2026 को शासन ने पुराने आदेश में फेरबदल करते हुए देवांगन का तबादला ‘मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत सक्ती’ के लिए कर दिया।

आदेश के 100 दिन बाद भी कुर्सी से मोह

नियमों के मुताबिक, 20 फरवरी के आदेश के बाद 2 मार्च तक देवांगन को सक्ती में जॉइनिंग दे देनी चाहिए थी। लेकिन आज 4 महीने (100 से अधिक दिन) बीत जाने के बाद भी वे कोरबा से कार्यमुक्त नहीं हुए हैं। सूत्र बताते हैं कि उन्होंने रसूख के दम पर अपना ट्रांसफर सूरजपुर से सक्ती तो करवा लिया, लेकिन अब वे सक्ती भी नहीं जाना चाहते और किसी भी कीमत पर कोरबा में ही बने रहना चाहते हैं।

गंभीर प्रशासनिक चिंता: कोरबा बना ‘तबादला रद्द’ कराने का सुरक्षित ठिकाना?

शासन के इतने स्पष्ट और कड़े निर्देशों की इस तरह खुलेआम अवहेलना होना कोरबा जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

तबादला मजाक बना: कोरबा जिले में यह कोई पहला मामला नहीं है। शासन के ट्रांसफर ऑर्डर को ठेंगे पर रखना यहाँ के कई अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए बेहद आसान खेल बन चुका है। इसका एक और ताजा उदाहरण कटघोरा खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) कार्यालय भी बना हुआ है, जहाँ नियमों को ताक पर रखा जा रहा है।

अब देखना यह है कि उपमुख्यमंत्री के प्रभार वाले जिले में जिला प्रशासन शासन के आदेशों का पालन कड़ाई से करवा पाता है, या फिर यह ‘कुर्सी मोह’ का खेल ऐसे ही चलता रहेगा?

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