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वानुआतु की नागरिकता, UAE की दावेदारी और ओमान में कानूनी पेच… सौरभ चंद्राकर को भारत लाने में ऐसे मिली बड़ी सफलता !

महादेव सट्टा मामले में भारत को क्यों लड़नी पड़ी अंतरराष्ट्रीय कानूनी लड़ाई ? ओमान की अदालत में भारतीय नागरिकता की पुष्टि से लेकर प्रत्यर्पण की शर्तों तक, जानिए कैसे खुला भारत वापसी का रास्ता

रायपुर। हजारों करोड़ रुपये के कथित ऑनलाइन सट्टा नेटवर्क से जुड़े महादेव ऑनलाइन बुक मामले के आरोपी सौरभ चंद्राकर को भारत लाना भारतीय जांच एजेंसियों के लिए आसान नहीं था। मामला केवल एक आरोपी को विदेश से वापस लाने का नहीं था, बल्कि इसके पीछे नागरिकता का विवाद, दो देशों की प्रत्यर्पण संबंधी दावेदारी, दस्तावेजों की वैधता और अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रियाओं की कई परतें थीं। आखिरकार भारत ने इन मुश्किलों के बीच अपना पक्ष मजबूत किया और सौरभ चंद्राकर को भारत लाने में सफलता हासिल की। खोजी पत्रकार व विशेष संवाददाता मुकेश एस सिंह की सेंट्रल छत्तीसगढ़ के अग्रणी अंग्रेजी अख़बार में छपी एक विशेष रिपोर्ट में इस पूरी कानूनी लड़ाई के कई अहम पहलुओं का खुलासा किया गया है।

एक आरोपी, दो देशों की दावेदारी और ओमान की अदालत

सौरभ चंद्राकर को भारत लाने के लिए भारतीय एजेंसियां प्रत्यर्पण की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही थीं। इसी दौरान संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की ओर से भी उसके प्रत्यर्पण का अनुरोध किया गया। यानी ओमान के सामने एक ही व्यक्ति को लेकर दो देशों की मांग थी।

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यहां भारत के लिए चुनौती केवल अपना प्रत्यर्पण अनुरोध पेश करना नहीं, बल्कि यह साबित करना भी था कि भारतीय नागरिकता, अपराध से जुड़े आरोपों और कानूनी दस्तावेजों के आधार पर भारत का दावा अधिक मजबूत है।

वानुआतु की नागरिकता का दावा बना बड़ी चुनौती

रिपोर्ट के मुताबिक, सौरभ चंद्राकर ने ओमान की अदालत में अपनी नागरिकता और दस्तावेजों को लेकर आपत्तियां उठाईं। उसने वानुआतु की नागरिकता हासिल करने का दावा किया। साथ ही UAE में वर्ष 2025 में बरी होने की दलील भी रखी।

इन दलीलों से प्रत्यर्पण की प्रक्रिया और जटिल हो गई। लेकिन भारत ने इस मोर्चे पर अपना पक्ष मजबूती से रखा। 16 जुलाई को अदालत ने मस्कट स्थित भारतीय दूतावास से स्पष्टीकरण मांगा। इसके जवाब में 30 अगस्त को भारतीय दूतावास ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की कि सौरभ चंद्राकर भारतीय नागरिक है।

अदालत ने माना कि वानुआतु की नागरिकता का दावा अपने आप भारत के प्रत्यर्पण अनुरोध को रोकने का आधार नहीं बन सकता, बशर्ते कानूनी शर्तें पूरी हों।

भारत ने दिए ऐसे आश्वासन, जिनसे मजबूत हुआ प्रत्यर्पण

प्रत्यर्पण की प्रक्रिया में केवल आरोप और गिरफ्तारी वारंट पर्याप्त नहीं होते। संबंधित देश को यह भरोसा भी दिलाना पड़ता है कि आरोपी के साथ कानूनी प्रक्रिया के तहत व्यवहार होगा।

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मुकेश एस सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने ओमान को कई महत्वपूर्ण आश्वासन दिए। इनमें निष्पक्ष सुनवाई, प्रत्यर्पण से पहले के असंबंधित अपराधों के लिए मुकदमा नहीं चलाने और ओमान की सहमति के बिना आरोपी को किसी तीसरे देश को नहीं सौंपने की शर्तें शामिल थीं।

वहीं UAE की ओर से भेजे गए अनुरोध में ऐसे आवश्यक आश्वासनों की कमी बताई गई। यही अंतर भारत के पक्ष में महत्वपूर्ण साबित हुआ। ओमान की अदालत ने भारतीय अनुरोध को प्राथमिकता दी और UAE की मांग को स्वीकार नहीं किया।

ओमान में एक और कानूनी मामला, इसलिए आसान नहीं था रास्ता

भारत के पक्ष में फैसला आने के बाद भी सौरभ चंद्राकर की तत्काल वापसी का रास्ता पूरी तरह साफ नहीं हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक, ओमान में उसके खिलाफ कथित रूप से फर्जी यात्रा दस्तावेज के इस्तेमाल से जुड़ी अलग कार्यवाही चल रही थी।

ओमान के सीब प्राइमरी कोर्ट में इस मामले की प्रक्रिया पूरी होना भी जरूरी था। इसी वजह से प्रत्यर्पण के फैसले और भारत स्थानांतरण के बीच कानूनी औपचारिकताएं बनी रहीं। अंततः 1 नवंबर को चंद्राकर को भारत लाया गया।

अब रायपुर में जांच और अदालत की कार्यवाही पर नजर

महादेव ऑनलाइन सट्टा नेटवर्क के कथित संचालन और वित्तीय लेन-देन को लेकर जांच एजेंसियां पहले से सक्रिय हैं। जानकारी के अनुसार, इस मामले में CBI की दो चार्जशीट और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की अभियोजन शिकायत दाखिल हो चुकी है।

चंद्राकर की भारत वापसी के बाद अब जांच और न्यायिक प्रक्रिया में उससे पूछताछ, कथित वित्तीय नेटवर्क तथा अन्य संबंधित लोगों की भूमिका जैसे पहलू महत्वपूर्ण होंगे।

सौरभ चंद्राकर को भारत लाने की यह पूरी प्रक्रिया बताती है कि बड़े आर्थिक अपराधों के मामलों में जांच केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहती। जब आरोपी विदेश में हो और अलग-अलग देशों की कानूनी प्रक्रियाएं सामने हों, तब प्रत्यर्पण के लिए मजबूत दस्तावेज, कूटनीतिक समन्वय और कानूनी आश्वासन निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भारत की सफलता के पीछे भी यही लंबी कानूनी और कूटनीतिक कवायद रही।

साभार : मुकेश एस. सिंह, (खोजी पत्रकार)

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