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भारत की राजनीति और वंशवाद का मोह: क्या लोकतंत्र थक चुका है?

✍ विशेष टिप्पणी: कान्हा तिवारी | www.nyaydhani.com/opinion/dynasty-democracy-crisis

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“जनता का शासन” या “परिवार का उत्तराधिकार”?

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भारतीय लोकतंत्र का सौंदर्य इसकी विविधता, बहस और प्रतिनिधित्व में है। लेकिन आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी जब संसद में सबसे शक्तिशाली कुर्सियाँ कुछ चुनिंदा परिवारों की जागीर बनी रहें, तो यह सवाल उठाना लाज़मी है — क्या लोकतंत्र अब थकने लगा है?

■ कांग्रेस: पार्टी या पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड?

देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस, आज अपने ऐतिहासिक विरासत से ज्यादा एक वंश-प्रधान संस्था के तौर पर जानी जा रही है। पार्टी के निर्णय, रणनीति, और नेतृत्व — सब कुछ एक परिवार विशेष के इर्द-गिर्द सिमट गया है।

प्रियंका गांधी वाड्रा का हालिया बयान — “आप नहीं समझेंगे कि शहादत क्या होती है” — भावनात्मक भले हो, लेकिन इसने देश में एक व्यापक बहस छेड़ दी है।
क्या सार्वजनिक मंचों पर व्यक्तिगत पीड़ा को राष्ट्रीय पीड़ा से ऊपर रख देना लोकतांत्रिक शिष्टाचार के अनुरूप है?

■ क्या देश की बाकी पीड़ाएँ महत्वहीन हैं?

देश के हर कोने में लाखों परिवार हैं जिन्होंने विभाजन, आतंकवाद, नक्सलवाद, सीमाई युद्धों और धार्मिक हिंसा में अपनों को खोया है।
कश्मीरी पंडितों का विस्थापन हो या माओवादी हिंसा में आदिवासी युवकों की शहादत — क्या ये दुख किसी एक राजनीतिक परिवार के दुःख से कमतर हैं?

यदि “त्याग और बलिदान” ही राजनीतिक वैधता का आधार हो, तो फिर सत्ता में वापसी की आकांक्षा किस तर्क से न्यायोचित है?

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वंशवाद बनाम योग्यता: चुनाव किसका हो?

राजनीति तब विकृत हो जाती है, जब उसमें जनप्रतिनिधित्व नहीं बल्कि वंशानुक्रम हावी हो जाता है। जब एक पार्टी में टिकट बंटवारा या संगठनात्मक पद रक्त संबंधों से तय हों, तो जमीनी कार्यकर्ता, नीतिगत सोच और जनहित — सब हाशिए पर चले जाते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि लोकतंत्र की आत्मा तब घायल होती है, जब वंश विचारधारा पर हावी हो जाए और लोकसेवा सिर्फ एक खानदानी सुविधा बन जाए।

संपत्ति, सत्ता और सवाल: कब होगा हिसाब?

राजनीतिक परिवारों की संपत्ति में असामान्य वृद्धि लंबे समय से चर्चा का विषय रही है।
रॉबर्ट वाड्रा पर लगे भू-माफिया और भूमि घोटाले के आरोप भले ही अदालत में सिद्ध न हुए हों, लेकिन राजनीतिक पारदर्शिता की दृष्टि से यह गंभीर मामला है।
जनता जानना चाहती है कि जब राजनीतिक परिवारों की संपत्ति बेतहाशा बढ़ती है, तो उसका जवाबदेह कौन है?

संसद में गिरता विमर्श, टूटता जनविश्वास

भारतीय संसद कभी विचारधारा और नीति की भट्टी हुआ करती थी, आज वह भावनात्मक नारेबाज़ी और वंशवादी आरोप-प्रत्यारोप का मंच बनती जा रही है।
जनता का यह सवाल जायज़ है कि क्या उनके मुद्दे — महंगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार — अब राजनीतिक विमर्श से बाहर हो चुके हैं?

क्या नेता अब जनता की आवाज़ नहीं, बल्कि अपने घराने की गाथा सुनाने में व्यस्त हैं?

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