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नहीं रहीं पंडवानी की अमर आवाज़: पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन, छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अपूरणीय क्षति

दुर्ग 5 जुलाई । छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्वभर में नई पहचान दिलाने वाली विश्वविख्यात पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। 72 वर्ष की आयु में उन्होंने रायपुर स्थित एम्स में अंतिम सांस ली। वे पिछले 27 मई से उपचाररत थीं और 4 व 5 जुलाई की देर रात करीब 3:15 बजे उनका निधन हो गया। उनके निधन से पूरे छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। 

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दुर्ग जिले के गनियारी गांव की रहने वाली तीजन बाई ने महज 13 वर्ष की उम्र में अपने नाना से पंडवानी गायन की शिक्षा ली थी। अपनी अद्भुत प्रतिभा और कापालिक शैली की दमदार प्रस्तुतियों से उन्होंने महाभारत की कथाओं को ऐसी जीवंतता दी कि देश ही नहीं, दुनिया भर के दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए।

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पंडवानी को देश-विदेश तक पहुंचाया 
भारत के साथ-साथ एशिया, यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनके योगदान के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि, कला शिरोमणि सहित अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान और मानद डी.लिट्. की उपाधि भी प्राप्त हुई। 

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पैतृक गांव गनियारी में होगा अंतिम संस्कार
बताया जा रहा है कि पिछले एक महीने से वे भोजन नहीं कर पा रही थीं और केवल जूस व अन्य पेय पदार्थों के सहारे थीं। उनके परिवार में बेटा, बहू और नातिन हैं, जिनके साथ वे गनियारी गांव में निवास करती थीं।

डॉ. तीजन बाई का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी में किया जाएगा, जहां उनके पार्थिव शरीर को पूरे राजकीय सम्मान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पंचतत्व में विलीन किया जाएगा।

डॉ. तीजन बाई का जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति के एक स्वर्णिम युग का अवसान है। उनकी बुलंद आवाज़ और पंडवानी की विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी। 

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