आयोजनआस्थाइतिहासकोरबागौरव गाथाछत्तीसगढ़पर्व त्यौहारप्रेरणासंगठनसामाजिक

आदिवासी समाज में प्रकृति पूजा की प्राचीन परंपराः पहाड़ी मंदिरों में बिना प्रतिमा के होती है पूजा

कोरबा, 15 अक्टूबर। आदिवासी बाहुल्य कोरबा जिले में पर्वतों पर विराजमान देवियों की आराधना की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। वनांचल और पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित देवी मंदिरों की पूजा पद्धति, धार्मिक मान्यताएं और अनुष्ठान अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। कहीं देवी को प्रसन्न करने के लिए श्वेत ध्वज चढ़ाया जाता है, तो कहीं नवरात्र का शुभारंभ प्रतिपदा के बजाए पंचमी तिथि से होता है।

Advertisement Carousel
R.O. No. : 13952/ 36

पोड़ी उपरोड़ा के मातिन दाई मंदिर में देवी की प्रतिमा के स्थान पर उनके आसन की पूजा की जाती है। वहीं, पाली के चौतुरगढ़ में पहाड़ की ऊंचाई पर विराजमान अष्टभुजी देवी का मंदिर प्राचीन स्थापत्य कला और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now

जिले के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों में कोसगाईगढ़ मंदिर का विशेष महत्व है। पहाड़ के ऊपर विराजमान देवी के मंदिर में श्वेत ध्वज चढ़ाकर पूजा करने की परंपरा प्रचलित है। मान्यता है कि यहां सदियों से श्रद्धालु अपनी आस्था के साथ पहुंचकर देवी की आराधना करते आ रहे हैं। मंदिर में लगभग 1200 वर्षों से पूजा-अनुष्ठान की परंपरा चली आने की बात कही जाती है।

इतिहासकारों का मानना है कि इस क्षेत्र में कभी हैहयवंशी राजाओं का साम्राज्य था। राजा बहारसाय के शासनकाल में यह क्षेत्र समृद्धि के शिखर पर था। तत्कालीन राजाओं ने पहाड़ को किले के रूप में विकसित किया था। आज भी यहां किले के अवशेष देखे जा सकते हैं, जो क्षेत्र के ऐतिहासिक वैभव की याद दिलाते हैं। पोड़ी उपरोड़ा क्षेत्र स्थित मातिन दाई मंदिर की पूजा पद्धति अन्य देवी मंदिरों से अलग है। यहां देवी की प्रतिमा के बजाय उनके आसन की पूजा की जाती है।

प्राचीन काल में इस क्षेत्र को मातिन राज के नाम से जाना जाता था और यहां गोंड राजाओं का शासन था। आदिवासी समाज में प्रकृति पूजा की प्राचीन परंपरा रही है, जिसका प्रभाव आज भी यहां के धार्मिक अनुष्ठानों में दिखाई देता है। मड़वारानी पहाड़ पर विराजमान देवी माता का धार्मिक महत्व भी विशिष्ट है। मान्यता के अनुसार, यहां देवी पांच महाशक्तियों के साथ विराजमान हैं। मंदिर में चौत्र नवरात्र का शुभारंभ शुक्ल प्रतिपदा से होता है, लेकिन क्वांर यानी शारदीय नवरात्र की पूजा प्रतिपदा के बजाय पंचमी तिथि से शुरू होती है।

गुरुवार से मड़वारानी पहाड़ ऊपर नवरात्र पर्व शुरु होगा और कलश स्थापना के साथ जवारे बोए जाएंगे। यही परंपरा इस मंदिर को जिले के अन्य देवी स्थलों से अलग पहचान देती है। मंदिर में सप्तमी की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। इस अवसर पर देवी माता को हल्दी का लेप लगाया जाता है और खीर का प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है।

नवरात्र के दौरान यहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जसगीत गायन का आयोजन भी होता है। अंतिम दिन जवारा और ज्योति कलश विसर्जन की यात्रा विशेष आकर्षण रहती है। इस यात्रा में क्षेत्र की महिलाएं बड़ी संख्या में भाग लेती हैं। विधि-विधान से निकाली गई यात्रा के बाद हसदेव नदी में जवारा का विसर्जन किया जाता है। पाली क्षेत्र के चौतुरगढ़ पहाड़ पर स्थित अष्टभुजी देवी का मंदिर जिले की धार्मिक और स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। भूमि तल से लगभग 300 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पहाड़ पर नागर शैली में निर्मित विशाल मंदिर प्राचीन वास्तुकला की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है। पहाड़ की ऊपरी शिखर पर तालाब का होना भी यहां के प्राकृतिक भूगोल को विशिष्ट बनाता है।

  Janjgir-Champa News:– 6 दोस्तों ने युवक को पीट-पीटकर मार डाला, गला घोंटकर शव फेंका – सभी आरोपी गिरफ्तार

चौतुरगढ़ को छत्तीसगढ़ का शिमला भी कहा जाता है। पहाड़, हरियाली और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं के साथ पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। जिले के पहाड़ी देवी मंदिरों की तरह यहां भी नवरात्र के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों के आसपास बसे गांवों में भी कोसगाई, मड़वारानी, मातिन दाई और अष्टभुजी देवी को माता चौरा में स्थापित कर पूजा करने की परंपरा है। इससे स्पष्ट होता है कि इन देवी स्थलों की आस्था केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और लोक संस्कृति का भी अभिन्न हिस्सा है।

पहाड़ों पर स्थित देवी मंदिरों में नवरात्र के दौरान जवारा बोने और ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। वर्ष में आने वाले दोनों नवरात्र पर्वों पर मंदिरों में ज्योति कलश स्थापित किए जाते हैं। नौ दिनों तक श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला जारी रहता है। भक्त देवी के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मड़वारानी मंदिर में नवरात्र के अंतिम दिन आयोजित कलश विसर्जन यात्रा में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल होती हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निकाली जाने वाली यह यात्रा क्षेत्र की धार्मिक एकजुटता और लोक संस्कृति का प्रतीक है।

नवरात्र के दौरान शहर के दुर्गा पंडालों में गरबा, डांडिया और जगराता की रौनक बढ़ रही है। इसके विपरीत पहाड़ी देवी मंदिरों में लोक परंपराओं के अनुरूप जसगीत गायन का विशेष उत्साह दिखाई देता है। मादर की थाप और झांझ की धुन पर देवी की महिमा का गुणगान किया जाता है। गांव-गांव से जसगीत गाने वाली टोलियां मंदिरों में पहुंचकर अपनी प्रस्तुति देती हैं। मंदिर प्रबंधन की ओर से भी इन टोलियों को आमंत्रित किया जाता है। भक्ति गीतों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और सामूहिक आराधना के बीच पहाड़ी देवी मंदिरों में नवरात्र का उत्सव विशिष्ट रंग में नजर आता है।

Live Cricket Info

Related Articles

Back to top button