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ईरान में कठपुतली सरकार चाहते हैं – ट्रंप @ डॉ. सुधीर सक्सेना

• सुधीर सक्सेना
जंग की उलटी गिनती का दौर अंतत: खत्म हुआ। शनिवार को तड़के इससे पेश्तर कि ईरान में लोग हम बिरादरों को ‘सुब्ह ब खैर’ कह पाते, राजधानी तेहरान समेत कई ठिकाने बमों और मिसाइलों से थर्रा उठे। यह इस्राइल और अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ खुली जंग का ऐलान था। पिछले साल की दस रोजा लड़ाई के बाद बमुश्किल आठ माह भी नहीं बीते हैं कि ट्रंप-नेतन्याहू की जंगखोर-पॉलिसी ने एक बार फिर ईरान-इस्राइल और इर्दगिर्द के इलाके को अपनी चपेट में ले लिया। हमले से साफ है कि डोनाल्ड ट्रंप को जेनेवा में अमेरिका-ईरान वार्ता से कोई वास्ता नहीं है और वह किसी भी कीमत पर ईरान को सबक सिखाने पर आमादा है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो के निर्लज्ज अपहरण ने यह दर्शा दिया था कि निरंकुश और बेढब ट्रंप को विश्व जनमत और राजनयिक मर्यादाओं की राई-रत्ती चिंता नहीं है और वह अपनी स्वेच्छाचारीहनक में कहीं भी कभी भी कुछ भी कर गुजर सकते हैं। बिला शक ईरान के सुप्रीम क़ाइद 86 वर्षीय अयातुल्लाह खामेनेई ‘करो या मरो’ की विषम लड़ाई में उलझ गये हैं। ईरान में घरेलू अंसतोष के चलते उन्हें दोहरे संकट का सामना करना पड़ेगा। दमन-उत्पीड़न, महंगाई और पाबंदियों के चलते इस्लामी हुकूमत के विरोधियों की कमी नहीं है। गौरतलब है कि इस नाजुक मौके पर निर्वासित युवराज पहलवी ने आज ही ईरानी अवाम से सड़कों पर उतरने की अपील की है। यह भी छिपा नहीं है कि ट्रंप ईरान में कठपुतली सरकार चाहते हैं। अगर्चे वाशिंगटन-तेलअवीव धुरी ईरान में अपनी मुहीम में कामयाब होती है, तो इससे वैश्विक राजनीति में नये युग का सूत्रपात होगा और कोई भी देश आसानी से अमेरिका के समक्ष आँखें तरेरने की हिमाकत नहीं करेगा और अमेरिका के लिए किसी भी मुल्क की मुश्कें कसना कठिन नहीं होगा। इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस जंग में चीन और रूस की प्रतिष्ठा दाँव पर है और यह दोनों देश तेहरान के पतन को रोकने की अथक चेष्टा करेंगे। इन दोनों महाशक्तियों को नार्थ-कोरिया का भी साथ मिल सकता है। इस्लामी गरूर को नेस्तनाबूद करने और कठपुतली सरकार की स्थापना के अलावा अमेरिका के तीन अन्य लक्ष्य हैं : पहला तेल भंडारों और दूसरा यूरेनियम भंडार पर कब्जा तथा तीसरा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण। यह भी स्वयंसिद्ध है कि इस लड़ाई में आक्रामक धुरी के लिए मानवीय मूल्य या नैतिकता कोई मायने नहीं रखती। वियेतनाम युद्ध और गाजा में जातीय नरसंहार इसकी पुष्टि कर चुके हैं। शनिवार को ही मिनाब में प्राइमरी स्कूल में बमबारी इसका प्रमाण है, जिसमें 40 से अधिक नन्हीं बच्चियों की मौत हुई।
एक बारगी महाबली अमेरिका को छोड़ दें तो इस्राइल और ईरान की सैन्य शक्ति की तुलना से दिलचस्प तथ्य उभरते हैं। ईरान की आबादी जहां आठ करोड़ 84 लाख है, वहीं इस्राइल की जनसंख्या फकत 94 लाख। इस्राइल में जहां 1.70 लाख सक्रिय सैन्य कर्मी है, वहीं ईरान में छह लाख से कुछ ज्यादा। इस्राइल में रिजर्व सैनिकों की तादाद चार लाख 65 हजार है, तो ईरान में करीब साढ़े तीन लाख। ईरान जरूरत पड़ने पर 14 लाख रंगरूटों की सालाना भर्ती कर सकता है, वहीं इस्राइल एक लाख 32 हजार रंगरूट जुटा सकता है। ईरान जीवाश्म ईंधन और कच्चे तेल के मामले में विश्व में क्रमश: दूसरी और तीसरी पायदान पर है, लेकिन अमेरिका के प्रत्यक्ष सहयोग के अलावा इस्राइल की बड़ी ताकत है उसके पास विश्व का सत्रहवां विशालतम विदेशी मुद्रा भंडारा। ईरान के पास 1713 टैंक हैं तो इस्राइल के पास 1300 टैंक। ईरान के पास 66000 बख्तरबंद वाहन हैं, जबकि इस्राइल के पास 35985। मोबाइल राकेट प्रोजेक्टरों के मामले में ईरान (1517) इस्राइल (183) से बहुत आगे है। पारंपरिक तोपखाने में ईरान को इस्राइल पर बढ़त हासिल है किंतु वैज्ञानिकी में इस्राइल भारी है। इस्राइल के पास युद्धक एवं मालवाही विमान ज्यादा हैं और तकनीक भी अत्याधुनिक। इस्राइल के पास 48 तो ईरान के पास 13 हेलीकाप्टर हैं। इस्राइल के पास तेज नौकाएं तो हैं, लेकिन युद्धपोत नहीं। जबकि ईरान के पास 107 पोत हैं और 25 पनडुब्बियां। इस्राइल के पास मात्र पांच पनडुब्बियां हैं। दिलचस्प तौर पर ईरान के 15.45 बिलियन डॉलर के रक्षा बजट के मुकाबले इस्राइल का रक्षा बजट 30.5 बिलियन डॉलर यानि करीब दो गुना है। इस जंग में इस्राइल को सबसे बड़ा सामरिक लाभ अमेरिका के साथ होने से है, क्योंकि ईरान के इर्दगिर्द इस्लामी देशों में अमेरिकी नौसैनिक अड्डों की कतार है और जेराल्ड फोर्ड युद्धपोत की मौजूदगी से उसे मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल है।
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