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छत्तीसगढ़ में संविदा कर्मचारियों की हड़ताल: वादों और घोषणाओं के बीच जमीनी हकीकत

छत्तीसगढ़ में संविदा कर्मचारियों की हड़ताल: वादों के बोझ तले जमीनी हकीकत

रायपुर छत्तीसगढ़ में संविदा और कर्मचारी संगठनों का हड़ताल आंदोलन एक बार फिर सुर्खियों में है। सवाल यह है कि आखिर क्यों बार-बार कर्मचारी संगठनों को आंदोलन की राह पकड़नी पड़ती है और सरकारें इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाल पा रही हैं?

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चुनाव से पहले राजनीतिक दल बड़े-बड़े वादे और घोषणाएं करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद वही वादे प्राथमिकता सूची से गायब हो जाते हैं। जिन समूहों का वोट बैंक बड़ा होता है, उनकी मांगों को तुरंत महत्व दिया जाता है, जबकि छोटे संगठन और संविदा कर्मचारी वर्षों तक अनदेखे रह जाते हैं।

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कर्मचारी संगठनों का कहना है कि आंदोलन या हड़ताल किसी का शौक नहीं बल्कि मजबूरी है। सैकड़ों ज्ञापन, निवेदन और सांकेतिक प्रदर्शन के बाद भी जब सरकार ध्यान नहीं देती, तो कर्मचारियों को अनिश्चितकालीन हड़ताल जैसे कदम उठाने पड़ते हैं।

राज्य में कार्यरत करीब 16,000 एनएचएम कर्मी पिछले दो वर्षों में 170 से अधिक बार विधायकों, मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन सौंप चुके हैं। इसके बावजूद उनकी मांगें अभी तक अधर में हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ कहे जाने वाले इन कर्मचारियों की अनदेखी अब सीधे जनजीवन को प्रभावित कर रही है।

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कर्मचारियों का आरोप है कि कैबिनेट बैठकों में संवैधानिक पदों के लिए वेतन-भत्तों पर तुरंत निर्णय हो जाता है, लेकिन संविदा कर्मचारियों की समस्याओं पर चर्चा तक नहीं होती। यही कारण है कि अब हड़ताल आंदोलन प्रदेश में एक आम तस्वीर बन चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी घोषणाओं को सिर्फ ‘रेवड़ी’ की तरह बांटने की बजाय ऐसी घोषणाएं होनी चाहिए जिन पर अमल संभव हो। वरना, बार-बार होने वाली हड़तालें लोकतंत्र और सुशासन दोनों की साख पर सवाल खड़े करती रहेंगी।

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