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सोनिया गांधी की ‘बिलांगिंग : ए जर्नी ऑफ लव’ किताब छपानी है, तो बदलो मजमून!

  • डॉ. सुधीर सक्सेना

सोनिया गांधी की ‘बिलांगिंग : ए जर्नी ऑफ लव’
किताब छपानी है, तो बदलो मजमून!
• डॉ. सुधीर सक्सेना

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पैंगुइन द्वारा श्रीमती सोनिया गांधी की किताब ‘बिलांगिंग : ए ‘जर्नी ऑफ लव’ का प्रकाशन खटाई में पड़ गया है। यकीनन, यह एक विरल प्रसंग है, जो प्रकाशक और लेखक के संबंधों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मिथ को तोड़ता है। प्रकाशक नामचीन है, तो लेखिका की भी वैश्विक ख्याति और छवि है। नेहरू-गाँधी परिवार की यह चर्चित नेत्री सात बार की सांसद, दो सांसदों की मां, पूर्व प्रधानमंत्री की अर्द्धांगिनी और देश की इकलौती और शक्तिशाली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुत्रवधू है। ‘टाइम’ पत्रिका ने उसे विश्व की चुनिंदा ताकतवर महिलाओं में शुमार किया था, जो 21वीं सदी की पहली दहाई में दो बार किंगमेकर रही और अपनी विरक्ति के कारण जिसने स्वयं पीएम बनने से इंकार कर दिया था।
श्रीमती गांधी पहले भी लेखन और संपादन से जुड़ी रही हैं, लेकिन यह भारत में उनके लगभग छह दशकों में बीते जीवन का सर्वाधिक प्रामाणिक ब्यौरा है। यह गहरे प्रेम में डूबी, लेकिन राजनीति में आने की अनिच्छुक इटली के एक गांव में जनमी युवती के दर्पवान और गरिमामयी राजनेत्री में रूपांतरण की रोचक गाथा है। प्रकाशक अल्फ्रेड ए. नॉप्फ (Knopf) के मुताबिक यह विश्व की अग्रणी महिलाओं में से एक की प्रेम, परिवार और अपरिमित आकर्षण के धनी देश भारत में बिताये गये छह दशकों में दृश्य सामाजिक और राजनीतिक तब्दीलियों का अनूठा वृत्तांत है। पुस्तक की पांडुलिपि प्रकाश को अर्सा पहले सौंपी गयी थी। उसका आवरण रंगीन लकदक न होकर ब्लैक एंड व्हाइट (श्वेत-श्याम) है यानि गोपन नहीं तय था कि पहले संस्करण की एक लाख प्रतियां छापी जायेंगी। यह सब दर्शाता है कि प्रकाशक को यकीन था कि किताब न सिर्फ चर्चित होगी, वरन बेस्ट सेलर भी साबित होगी। तय हो गया था कि पहला संस्करण 10 नवंबर को जारी होगा, मगर यकबयक प्रकाशक ने पांडुलिपि के कतिपय अंशों में परिवर्तन और किन्हीं अंशों के विलोपन की शर्त लगा दी, जिसे श्रीमती गांधी ने ठुकरा दिया। इस इंकार का नतीजा हुआ कि पैंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने हाथ उठा दिये।
श्रीमती गांधी वाचाल नेत्री नहीं हैं। वह कम बोलती हैं। उन्होंने बहुत अपमान और लांछन झेले हैं, लेकिन कभी आपा नहीं खोया। उन्होंने कहा -“मेरे परिवार के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन बहुत कम ही ऐसी बातें सामने आई हैं, जो उनके इरादों, उनके कामों और उनकी इंसानी कमियों की सच्चाई तक पहुंच पाई।” उन्होंने आगे कहा – “दिल टूटने और नुकसान झेलने के बाद ही मैं राजनीति की सार्वजनिक दुनिया में आई। उससे पहले तक मैंने अपनी निजता को बहुत सख्ती से बचाकर रखा था।”
श्रीमती गांधी का यह कहना सही है कि अपनी जिंदगी के बारे में लिखना आसान नहीं होता। इसका मतलब था खुद को खोलना, उन पलों और अनुभवों को साझा करना, जिन्हें उन्होंने अंदर छिपाकर रखा था। यही वे संदर्भ हैं, जो इस 744 पेजी किताब के ऐतिहासिक दस्तावेज होने को बल प्रदान करते हैं। किताब में गजब की रोचकता है और रूमानियत और रवानी भी। श्रीमती गांधी राजनीति के अनेक गूढ़ प्रसंगों की गवाह रही हैं। हालांकि, पैंगुइन के सीईओ गौरव श्री नागेश और श्रीमती गांधी के एजेंट डेविड गाडविन ने चुप्पी साध ली है, किंतु सूत्रों के मुताबिक दोनों पक्षों के बीच तीन अहम हिस्सों पर बातचीत हुई है, प्रथम, चीन के साथ सीमा विवाद, द्वितीय पीएम नरेन्द्र मोदी की नीतियां और कार्यशैली तथा तृतीय आरएसएस का राजनीति में दखल और तीखे दबाव का नतीजा। बताते हैं कि सोनिया ने संशोधनों और विलोपन से यह कहर इंकार कर दिया कि तथ्य और विचार उनके अनुभव व नजरिये पर आधारित हैं, अत: बदलाव का प्रश्न ही नहीं। यद्यपि उनका कोई अधिकृत बयान नहीं आया है, अलबत्ता अशोक गहलोत समेत कांग्रेसी नेताओं ने मोर्चा संभाल लिया है। वे मानते हैं कि यह बीजेपी की सोची-समझी चाल है और दबाव का नतीजा है।
अतीत को खंगालें तो भारत में यह ऐसी पहली घटना है। एमएम नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ का प्रकरण भिन्न है। वह छपी भी और नहीं भी। जो सोको (Joe Socco) की दंगों पर ‍लिखी किताब ‘द वंस एंड फ्यूचर रायट्स’ छपी नहीं और वेंडी डोनीगर की किताब लुग्दी बनाकर नष्ट करनी पड़ी। विदेशों की बात करें तो एफ स्काट फिटजेराल्ड से संपादक मैक्सवेल पर्किन्स ने ‘द ग्रेट गैट्सबी’ के कुछ अंश सुधारने को कहा था, जेके राउलिंग से संपादक ने हैरी पाटर सीरीज की पहली किताब में संशोधन को कहा था और स्टीफेन किंग से संपादक ने भारी भरकम हॉरर उपन्यास के दर्जनों पेज हटाने को कहा था। बहरहाल, पैंगुइन के अनुसार संशोधन और विलोपन का सुझाव उनका दायित्व और विशेषाधिकार तथा दोनों पक्षों के हित में है। मुद्दा है कि अचानक हाथ उठाने के पीछे पेंच क्या है : कंटेंट अथवा दबाव? प्रश्न यह भी है कि किताब भारत में भले ही न छपे, लेकिन अमेरिका में रिलीज से क्या वह दुनिया भर में पाठकों के हाथों में नहीं पहुंचेगी? फर्ज कीजिये कि श्रीमती गांधी कतिपय संशोधनों को तैयार हो जातीं तो क्या भारतीय और विदेशी संस्करणों के कंटेंट में अंतर नहीं होता? लिहाजा शक की सुई में कंपनी से भला कौन इंकार करेगा? बहरहाल, खबर है कि इसके प्रकाशन के लिये हार्पर कालिंस आगे आये हैं।

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लेखक : डॉ. सुधीर सक्सेना

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