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बारिश की हर बूंद बचाने में छत्तीसगढ़ देश में नंबर-1, जल संरक्षण के मॉडल ने दिल्ली में बनाई पहचान

रायपुर : बारिश का पानी बहकर बर्बाद न हो, खेत और गांव में गिरे तो वहीं सहेजा जाए और जमीन के भीतर पहुंचाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षित किया जाए। इसी सोच को जनभागीदारी से जमीन पर उतारने वाले छत्तीसगढ़ ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। जल शक्ति मंत्रालय के ‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान के तीसरे चरण यानी JSJB 3.0 में छत्तीसगढ़ ने देश में पहला स्थान हासिल किया है।

खास बात यह है कि राज्य की उपलब्धि केवल प्रदेश स्तर तक सीमित नहीं रही। सूरजपुर, महासमुंद, बालोद, बलौदाबाजार-भाटापारा और कबीरधाम देश के शीर्ष 10 जिलों में जगह बनाने में सफल रहे हैं। इसे जल संरक्षण के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की बढ़ती जनभागीदारी और स्थानीय स्तर पर किए जा रहे प्रयासों की बड़ी सफलता माना जा रहा है।

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प्रधानमंत्री मोदी के सामने मुख्यमंत्री साय ने रखा छत्तीसगढ़ का मॉडल

नई दिल्ली के सुषमा स्वराज भवन में आयोजित जल शक्ति मंत्रालय के विभागीय शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण के लिए किए जा रहे नवाचारों और जनभागीदारी आधारित मॉडल को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया।

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सम्मेलन के ‘कैच द रेन’ सत्र में उपमुख्यमंत्री श्री अरुण साव ने प्रदेश में वर्षा जल संचयन, भू-जल पुनर्भरण और पेयजल स्रोतों के संरक्षण को लेकर किए जा रहे कार्यों की जानकारी साझा की। सम्मेलन में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल सहित विभिन्न राज्यों के जल संसाधन मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

सरकार की योजना नहीं, गांव का जनअभियान बना जल संरक्षण

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ ने जल संरक्षण को केवल सरकारी योजनाओं और जल संरचनाओं के निर्माण तक सीमित नहीं रखा है। किसानों, ग्राम पंचायतों, जल सखियों, जल मित्रों और स्थानीय समुदायों को अभियान से जोड़कर इसे व्यापक जनभागीदारी का स्वरूप दिया गया है।

मुख्यमंत्री ने अपने किसान परिवार से जुड़े होने का उल्लेख करते हुए कहा कि वे अपने गृहग्राम बगिया में स्वयं हल चलाकर खेती कर चुके हैं। इसलिए खेती और ग्रामीण जीवन में पानी की अहमियत को उन्होंने बेहद करीब से महसूस किया है। किसान के लिए पानी सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उसकी फसल, आजीविका, परिवार और भविष्य से जुड़ा सवाल है।

यही सोच प्रदेश के जल संरक्षण अभियान में दिखाई देती है, जहां किसान को केवल योजना का लाभ लेने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जल बचाने की मुहिम का भागीदार बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

कोरिया का ‘5 प्रतिशत मॉडल’ बना देश के लिए मिसाल

जल संरक्षण के लिए छत्तीसगढ़ की सबसे चर्चित पहलों में से एक कोरिया जिले का ‘5 प्रतिशत मॉडल’ है। इस मॉडल में किसान अपनी कृषि भूमि का करीब 5 प्रतिशत हिस्सा स्वेच्छा से जल संरक्षण और भू-जल पुनर्भरण के लिए उपलब्ध करा रहे हैं।

खेत के इसी हिस्से में ऐसी जल संरचनाएं विकसित की जा रही हैं, जहां बारिश का पानी बहकर बाहर निकलने के बजाय वहीं रुक सके और धीरे-धीरे जमीन के भीतर पहुंच सके। इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि किसान यहां केवल हितग्राही नहीं, बल्कि जल संरक्षण के सक्रिय भागीदार हैं।

पंचायतों और स्थानीय समुदायों के सहयोग के साथ विभिन्न विभागों की योजनाओं को जोड़कर जल संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है। इन संरचनाओं की जियो-टैगिंग, मॉनिटरिंग और नियमित समीक्षा की व्यवस्था भी की गई है।

तीन चरणों में 28 लाख से ज्यादा जल संरचनाएं

‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान के तीन चरणों में छत्तीसगढ़ ने बड़े पैमाने पर जल संरचनाओं का निर्माण और पंजीयन किया है।

  • JSJB 1.0 : प्रदेश में 4 लाख 5 हजार 561 जल संरचनाएं बनाई गईं। इस चरण में छत्तीसगढ़ देश में दूसरे स्थान पर रहा।
  • JSJB 2.0 : 24 लाख 7 हजार 456 जल संरचनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 23 लाख 7 हजार 768 का काम पूरा हो चुका है। इस चरण में भी राज्य दूसरे स्थान पर रहा।
  • JSJB 3.0 : तीसरे चरण में 79 हजार 775 जल संरचनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 77 हजार 719 संरचनाओं का काम पूरा हो चुका है। इस चरण में छत्तीसगढ़ देश में पहले स्थान पर रहा।
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इन प्रयासों का उद्देश्य एक ही है — बारिश के पानी को बहने से रोकना, उसे स्थानीय स्तर पर सहेजना और अधिक से अधिक पानी को जमीन के भीतर पहुंचाना।

छत्तीसगढ़ के पांच जिले टॉप-10 में

राज्य की उपलब्धि के साथ उसके जिलों ने भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। सूरजपुर, महासमुंद, बालोद, बलौदाबाजार-भाटापारा और कबीरधाम जल संरक्षण के क्षेत्र में देश के शीर्ष 10 जिलों में शामिल हुए हैं।

इन जिलों में गांव और पंचायत स्तर पर वर्षा जल संचयन और भू-जल पुनर्भरण के कामों को स्थानीय जरूरतों के मुताबिक आगे बढ़ाया गया। खास तौर पर स्थानीय समुदायों को अभियान से जोड़ने पर जोर दिया गया।

26 से घटकर 19 हुए पानी की कमी वाले ब्लॉक

प्रदेश में जल संरक्षण के प्रयासों के बीच पानी की कमी वाले ब्लॉकों की संख्या में भी कमी दर्ज की गई है। राज्य में ऐसे ब्लॉकों की संख्या 26 से घटकर 19 रह गई है। इसके अलावा पांच क्रिटिकल ब्लॉकों के सामान्य श्रेणी में आने का अनुमान है।

जल संरचनाओं के निर्माण के साथ पुराने जल स्रोतों का संरक्षण, भू-जल पुनर्भरण, संरचनाओं की मैपिंग और स्थानीय स्तर पर निगरानी को भी अभियान का हिस्सा बनाया गया है।

‘जहां जल गिरे, वहीं सहेजें’ पर छत्तीसगढ़ का जोर

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ‘कैच द रेन — जहां जल गिरे, वहीं सहेजें’ संदेश को छत्तीसगढ़ ने अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप लागू करने पर जोर दिया है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में वर्षा, भू-जल स्थिति और स्थानीय जरूरतों के अनुसार जल संचयन तथा भू-जल पुनर्भरण की संरचनाएं विकसित की जा रही हैं।

सरकार का लक्ष्य है कि बारिश का अधिकतम पानी खेत और गांव की सीमा के भीतर रोका जाए। इससे भू-जल स्तर को मजबूत करने के साथ सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता को बेहतर बनाने में मदद मिल सके।

मुख्यमंत्री साय ने केंद्र के सामने रखे तीन बड़े सुझाव

राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्यमंत्री श्री साय ने केवल छत्तीसगढ़ की उपलब्धियां ही नहीं बताईं, बल्कि देशभर में जल संरक्षण अभियान को और प्रभावी बनाने के लिए कई सुझाव भी रखे।

उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक राज्य अपनी भौगोलिक स्थिति, बारिश के पैटर्न, भू-जल की स्थिति और स्थानीय जरूरतों के आधार पर अपना अलग ‘कैच द रेन प्लान’ तैयार करे।

बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करने के लिए ‘स्टेट वाटर अवार्ड्स’ शुरू करने का सुझाव भी दिया गया। इसके साथ ही BISAG-N के माध्यम से जल संरचनाओं की मैपिंग को मजबूत करने और मुख्य सचिव की अध्यक्षता में प्रत्येक तीन महीने में अभियान की समीक्षा करने की बात कही गई।

पानी बचेगा तो खेत भी बचेगा और गांव भी

जल संरक्षण का सीधा संबंध खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से है। खेत में बारिश का पानी रोकने और उसे जमीन में पहुंचाने से भू-जल पुनर्भरण बढ़ सकता है और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बेहतर हो सकती है। इससे किसानों की मानसून पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

पेयजल स्रोत मजबूत होने से ग्रामीण परिवारों को भी राहत मिल सकती है। खासकर महिलाओं को पानी जुटाने में लगने वाले समय और श्रम में कमी आने की संभावना है।

देश में 31 मई 2027 तक दो करोड़ नई जल संरचनाएं तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। ऐसे में छत्तीसगढ़ का जनभागीदारी आधारित मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर एक उपयोगी उदाहरण के रूप में सामने आया है।

छत्तीसगढ़ की इस उपलब्धि का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जल संरक्षण सिर्फ सरकारी विभागों का काम नहीं है। जब किसान अपनी जमीन का हिस्सा पानी के लिए छोड़ता है, पंचायत साथ खड़ी होती है और गांव के लोग मिलकर बारिश की बूंदों को सहेजते हैं, तब जल संरक्षण एक योजना नहीं बल्कि जनआंदोलन बन जाता है।

 

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