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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: समान काम, समान वेतन छत्तीसगढ़ के होमगार्ड जवानों की हुई बड़ी जीत

चार साल के संघर्ष और विभागीय अड़ंगों के बाद न्याय की जीत, अधिकारियों की मनमानी पर सर्वोच्च न्यायालय का कड़ा प्रहार

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नई दिल्ली। न्याय के पहिए भले ही धीमी गति से घूमें, लेकिन वे हमेशा सत्य की मंजिल तक पहुंचते हैं। छत्तीसगढ़ के नगर सेना (होमगार्ड) जवानों के लिए यह कहावत अब एक हकीकत बन चुकी है। वर्षों के शोषण और एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, अंततः देश की सर्वोच्च अदालत ने होमगार्ड जवानों के पक्ष में ‘समान काम, समान वेतन’ का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और विभागीय अधिकारियों को सख्त निर्देश दिया है कि आदेश जारी होने के तीन महीने के भीतर जवानों को पुलिसकर्मियों के समान वेतन और भत्ते हर हाल में दिए जाएं।

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अधिकारों की अनदेखी और न्याय युद्ध की शुरुआत
इस संघर्ष की नींव वर्ष 2022 में तब पड़ी थी, जब बिलासपुर उच्च न्यायालय ने होमगार्ड जवानों के पसीने और मेहनत का सम्मान करते हुए उन्हें ‘समान काम, समान वेतन’ देने का स्पष्ट आदेश दिया था। लेकिन विडंबना देखिए कि जिन कंधों पर न्याय का पालन करने की जिम्मेदारी थी, उन्हीं विभागीय अधिकारियों और सरकार ने इस आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

अपने अधिकारों की इस घोर अनदेखी से आहत होकर, होमगार्ड जवान डोमनलाल चंद्राकर और सुरेन्द्र कुमार देशमुख ने हार नहीं मानी। उन्होंने व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए छ.ग. शासन और महानिदेशक (नगर सेना, नागरिक सुरक्षा, अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवाएं, रायपुर) के खिलाफ उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका (क्र. 1036/2022) दायर कर दी।

अधिकारियों की जिद और न्यायालय का कड़ा रुख
न्यायालय के गलियारों में यह ‘न्याय युद्ध’ लगभग चार साल तक चला। जवानों के हक को दबाने के लिए कर्मचारी-विरोधी रवैया अपनाते हुए विभागीय अधिकारियों ने हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष रिट अपील (क्र. 320/2025) दायर की। हालांकि, न्यायपालिका ने इस अन्यायपूर्ण अपील को 10 जून 2025 को सिरे से खारिज कर दिया। इसके बावजूद अधिकारियों की जिद कम नहीं हुई और उन्होंने जवानों को उनके हक से वंचित रखने के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और SLP (सिविल) डायरी संख्या 51093/2025 दायर की।

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सर्वोच्च न्यायालय से मिला न्याय का सूर्योदय
13 फरवरी 2026 का दिन इन जवानों के लिए न्याय का नया सवेरा लेकर आया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिवादियों की SLP को न केवल खारिज किया, बल्कि यह कड़ा आदेश भी दिया कि अगले तीन माह के भीतर होमगार्ड जवानों को पुलिसकर्मियों के बराबर वेतन और भत्ते का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।

शोषण पर करारा तमाचा, चेहरों पर लौटी मुस्कान
नगरसेना के जवानों के लिए यह जीत महज एक कानूनी फैसला नहीं है; यह उन अधिकारियों की मनमानी और संवेदनहीनता पर न्यायपालिका का एक ‘करारा तमाचा’ है, जो वर्षों से जवानों का शोषण कर रहे थे। दिन-रात जनता की सुरक्षा में मुस्तैद रहने वाले इन जवानों को अपने ही हक के लिए एक थका देने वाली लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।

आज इस ऐतिहासिक जीत ने होमगार्ड जवानों के चेहरों पर उल्लास और दिलों में उम्मीद की नई किरण जगा दी है। न्याय के मंदिर से मिले इस सम्मान और अधिकार के लिए समूचे होमगार्ड महकमे ने माननीय न्यायालय का हृदय से विशेष आभार व्यक्त किया है। सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं- इस फैसले ने आज इस बात को फिर से सच साबित कर दिया है।

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