
कोरबा। शहर के चर्चित “शिवाय हॉस्पिटल” को लेकर एक और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। अस्पताल को अभी तक स्वास्थ्य विभाग से संचालन की अनुमति नहीं मिली है, लेकिन इसके बावजूद यहां ओपीडी के जरिए मरीजों का इलाज किया जा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि अस्पताल प्रबंधन ने 2 मार्च 2026 को ही मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय में नर्सिंग होम एक्ट के तहत लाइसेंस के लिए आवेदन किया है। नियमों के अनुसार किसी भी नए अस्पताल को आवेदन देने के बाद कम से कम 30 दिन तक इंतजार करना अनिवार्य होता है, ताकि इस दौरान स्वास्थ्य विभाग द्वारा निरीक्षण और अन्य औपचारिकताएं पूरी की जा सकें।
लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अस्पताल प्रबंधन को इस नियम से कोई मतलब नहीं है। आवेदन के कुछ ही दिनों बाद यहां मरीजों को देखने का सिलसिला शुरू हो गया है।
100 बेड अस्पताल, फिर भी नियमों की अनदेखी
सूत्रों के अनुसार “शिवाय हॉस्पिटल” लगभग 100 बेड क्षमता वाला अस्पताल है। इतने बड़े अस्पताल को शुरू करने से पहले स्वास्थ्य विभाग द्वारा कई मानकों की जांच की जाती है। इसमें भवन की संरचना, डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ, मेडिकल उपकरण, फायर सेफ्टी और बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं का निरीक्षण शामिल होता है।
इन सभी प्रक्रियाओं के पूरा होने और जिला स्वास्थ्य समिति की मंजूरी मिलने के बाद ही अस्पताल को लाइसेंस जारी किया जाता है।
लेकिन जानकारी के अनुसार अभी तक अस्पताल का निरीक्षण भी पूरा नहीं हुआ है। इसके बावजूद अस्पताल में चिकित्सा गतिविधियां शुरू कर दी गई हैं, जिससे नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
डॉ. दैविक एच. मित्तल देख रहे मरीज
सूत्रों के अनुसार अस्पताल में डॉ. दैविक एच. मित्तल द्वारा मरीजों को देखा जा रहा है। यहां बाकायदा मरीजों की ओपीडी की जा रही है और उनसे परामर्श शुल्क भी लिया जा रहा है।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ के पास रविवार 8 मार्च और सोमवार 9 मार्च को अस्पताल में आए दो मरीजों की ओपीडी स्लिप मौजूद है। इन मरीजों से 400 रुपये परामर्श शुल्क लेकर डॉक्टर द्वारा दवाइयां लिखी गई हैं।
ओपीडी स्लिप से यह स्पष्ट होता है कि अस्पताल में नियमित रूप से मरीजों को देखा जा रहा है और उपचार किया जा रहा है।
नियम क्या कहते हैं
स्वास्थ्य विभाग के नियमों के अनुसार किसी भी निजी अस्पताल या नर्सिंग होम को संचालन शुरू करने से पहले नर्सिंग होम एक्ट के तहत पंजीयन कराना अनिवार्य होता है। आवेदन प्राप्त होने के बाद विभाग की टीम संस्थान का निरीक्षण करती है और सभी आवश्यक मानकों की जांच करती है।
निरीक्षण रिपोर्ट तैयार होने के बाद नोडल अधिकारी अपनी अनुशंसा देते हैं और इसके बाद मामला जिला स्वास्थ्य समिति के समक्ष रखा जाता है। समिति की स्वीकृति मिलने के बाद ही अस्पताल को लाइसेंस जारी किया जाता है।
जब तक यह पूरी प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक अस्पताल में चिकित्सा सेवाएं शुरू करना नियमों के विरुद्ध माना जाता है।
अब प्रशासन पर उठ रहे सवाल
अस्पताल में बिना लाइसेंस चिकित्सा सेवाएं दिए जाने की जानकारी सामने आने के बाद अब स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अस्पताल को अभी तक वैध लाइसेंस प्राप्त नहीं हुआ है, तो आखिर किस अनुमति से यहां मरीजों का इलाज किया जा रहा है ?
फिलहाल इस पूरे मामले को लेकर शहर में चर्चा तेज हो गई है और अब सबकी नजर स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर टिकी हुई है कि क्या बिना अनुमति संचालित हो रही इन गतिविधियों पर रोक लगाई जाएगी या नहीं।

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