. रायपुर/कोरबा। भारतीय लोकतंत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ बड़े सुधारों की बातें हो रही हैं, लेकिन उनके संभावित प्रभावों पर गंभीर बहस भी जरूरी हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026 और परिसीमन विधेयक, 2026 इसी बहस के केंद्र में हैं।
प्रस्ताव के तहत लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की योजना है। यह कदम पहली नजर में महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा प्रयास लगता है, लेकिन इसके साथ कई महत्वपूर्ण सवाल भी खड़े हो रहे हैं—क्या यह सुधार है या राजनीतिक रणनीति?
सिर्फ संसद नहीं, पूरे सिस्टम में होगा विस्तार
यह बदलाव केवल लोकसभा तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पूरे राजनीतिक ढांचे पर पड़ेगा।
विधानसभाओं का विस्तार: राज्यों में सीटों की संख्या 30 से 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। बड़े राज्यों में यह संख्या काफी अधिक हो जाएगी।
राज्यसभा पर असर: विधानसभा सीटें बढ़ने से राज्यसभा के सदस्यों की संख्या भी बढ़कर करीब 400 तक पहुंच सकती है।
इस तरह यह एक व्यापक संरचनात्मक बदलाव होगा, जिसका असर देश की पूरी शासन व्यवस्था पर पड़ेगा।
आर्थिक बोझ: बढ़ती संख्या, बढ़ता खर्च
जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ने का सीधा मतलब है सरकारी खर्च में भारी इजाफा।
सांसदों और विधायकों पर केवल वेतन ही नहीं, बल्कि आवास, सुरक्षा, यात्रा भत्ते और विकास निधि पर भी बड़ी राशि खर्च होती है। ऐसे में सैकड़ों नए सांसद और हजारों नए विधायकों का जुड़ना राजकोष पर स्थायी बोझ बढ़ाएगा।
ऐसे समय में जब देश को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में निवेश की आवश्यकता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संसाधनों का यह उपयोग प्राथमिकता के अनुरूप है?
सशक्तिकरण बनाम राजनीति
इस प्रस्ताव के पीछे राजनीतिक समीकरण भी नजर आते हैं:
पार्टी प्रबंधन: अधिक सीटों से राजनीतिक दलों को अपने नेताओं को समायोजित करने में सुविधा मिलती है।
क्षेत्रीय असंतुलन: जनसंख्या आधारित परिसीमन से कुछ राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा, जबकि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों का प्रभाव घट सकता है।
सत्ता संतुलन: बड़ी पार्टियों को बहुमत बनाए रखने में आसानी हो सकती है, जिससे छोटे दलों की भूमिका सीमित हो सकती है।
क्या कोई सरल विकल्प नहीं था?
यदि उद्देश्य महिलाओं को प्रतिनिधित्व देना है, तो इसके लिए मौजूदा व्यवस्था में भी रास्ता मौजूद था।
रोटेशन मॉडल: वर्तमान 543 सीटों में ही 33% सीटें रोटेशन के आधार पर आरक्षित की जा सकती थीं।
तत्काल लाभ: इससे बिना परिसीमन की लंबी प्रक्रिया के महिलाओं को तुरंत प्रतिनिधित्व मिल सकता था।
कम आर्थिक बोझ: नई सीटें बनाए बिना ही लक्ष्य हासिल किया जा सकता था।
निष्कर्ष
लोकतंत्र की मजबूती केवल संख्या बढ़ाने से नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता बढ़ाने से होती है। महिला आरक्षण एक जरूरी और स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
जरूरत इस बात की है कि नीतियां संतुलित हों, आर्थिक रूप से व्यावहारिक हों और देश के संघीय ढांचे को मजबूत करें। महिला सशक्तिकरण का उद्देश्य तभी सार्थक होगा, जब वह राजनीति से ऊपर उठकर वास्तविक प्रतिनिधित्व और समान अवसर सुनिश्चित करे।
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