बस्तर की अस्मिता पर सियासत या बेवजह का विवाद ? CM विष्णु देव साय के राज में ‘मुरिया दरबार’ का नाम बदलने की अफवाह पर विराम ! राष्ट्रपति मुर्मु और CM साय की मौजूदगी में दिखेगी बस्तर की परंपरा की ताकत
आधिकारिक कार्यक्रम में मुरिया दरबार का नाम बरकरार, 23 अक्टूबर को सिरहासार भवन में होगा आयोजन; नाम बदलने की चर्चाओं पर प्रशासन का स्पष्ट संदेश

जगदलपुर। बस्तर की ऐतिहासिक परंपरा, आदिवासी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता और जनआस्था से जुड़े मुरिया दरबार को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच आधिकारिक कार्यक्रम सूची ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। बस्तर दशहरा पर्व-2026 के कार्यक्रम में 23 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे सिरहासार भवन में पारंपरिक मुरिया दरबार आयोजित होना दर्ज है। इस ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सहभागिता को लेकर भी विशेष उत्सुकता है।
बस्तर दशहरा समिति एवं प्रशासन की ओर से जारी स्पष्टीकरण में मुरिया दरबार का नाम बदले जाने की चर्चाओं को निराधार बताया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब आधिकारिक कार्यक्रम में मुरिया दरबार का नाम स्पष्ट रूप से मौजूद है, तो नाम परिवर्तन की चर्चा किस आधार पर शुरू हुई ? बस्तर जैसे संवेदनशील सांस्कृतिक क्षेत्र में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दस्तावेजों और तथ्यों की जांच आवश्यक है।
आदिवासी मुख्यमंत्री के नेतृत्व में परंपरा और पहचान पर फोकस
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं आदिवासी समाज से आते हैं। उनके नेतृत्व में बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक आयोजनों का महत्व राज्य की पहचान से जुड़ा विषय है। मुरिया दरबार जैसे ऐतिहासिक आयोजन में मुख्यमंत्री की सहभागिता इस परंपरा के प्रति राज्य सरकार की संस्थागत जिम्मेदारी और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करने का अवसर है।
मुरिया दरबार केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की उस परंपरा का प्रतीक है जिसमें समाज के पारंपरिक प्रतिनिधि, मांझी, चालकी, जनप्रतिनिधि और अन्य संबंधित पक्ष क्षेत्र की समस्याओं तथा जनहित के विषयों पर संवाद करते हैं। इस व्यवस्था की ऐतिहासिक पहचान को समझना और उसका सम्मान करना आवश्यक है।
राष्ट्रपति की सहभागिता से बस्तर की परंपरा को मिलेगा राष्ट्रीय मंच
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता बस्तर दशहरा के लिए महत्वपूर्ण अवसर है। जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत से समृद्ध बस्तर को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने के लिहाज से यह आयोजन विशेष महत्व रखता है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की मौजूदगी के साथ यह अवसर बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और परंपरागत सामाजिक व्यवस्था को व्यापक स्तर पर सामने लाने का माध्यम बन सकता है।
इतिहास और परंपरा पढ़ें:
बस्तर जिला प्रशासन: संस्कृति एवं विरासत
भारत सरकार का पर्यटन पोर्टल: बस्तर दशहरा
सहापीडिया: बस्तर दशहरा का ऐतिहासिक विवरण
बस्तर दशहरा की विशेषता यह है कि यहां दशहरा उत्सव का स्वरूप देश के कई अन्य हिस्सों से अलग है। मां दंतेश्वरी की आराधना और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी रस्मों के बीच यह पर्व जनजातीय समाज की सामूहिक भागीदारी से आगे बढ़ता है। मुरिया दरबार इसी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
600 साल पुरानी परंपरा, मुरिया दरबार का ऐतिहासिक महत्व
बस्तर दशहरा को लगभग छह शताब्दियों पुरानी परंपरा माना जाता है। बस्तर जिला प्रशासन और सांस्कृतिक इतिहास संबंधी स्रोतों में इसकी शुरुआत 15वीं सदी से जोड़ी गई है। इसकी खासियत यह है कि यहां दशहरा रावण दहन के बजाय मां दंतेश्वरी की आराधना और स्थानीय धार्मिक-सामाजिक परंपराओं के इर्द-गिर्द केंद्रित है।
मुरिया दरबार को ऐतिहासिक रूप से जनता की समस्याओं को सामने रखने और पारंपरिक प्रतिनिधियों के माध्यम से संवाद करने की व्यवस्था के रूप में जाना जाता है। आज भी इस आयोजन में पारंपरिक सामाजिक प्रतिनिधियों और जनप्रतिनिधियों की सहभागिता इसे विशिष्ट बनाती है। इसलिए इस परंपरा से संबंधित किसी भी सूचना को लेकर गंभीरता और तथ्यात्मक स्पष्टता जरूरी है।
कांग्रेस के आरोपों पर सवाल : जब आधिकारिक न्योते में ‘मुरिया दरबार’ ही, तो नाम बदलने का दावा किस आधार पर ?
मुरिया दरबार के नाम को लेकर कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी के विरोध और नाम बहाल करने की मांग ने राजनीतिक बहस को जरूर हवा दी, लेकिन अब सवाल कांग्रेस के दावों के आधार पर भी उठने लगे हैं। बस्तर दशहरा समिति और प्रशासन ने भी नाम बदलने की चर्चाओं को निराधार बताया है। ऐसे में केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर आदिवासी समाज की ऐतिहासिक परंपरा से खिलवाड़ होने का निष्कर्ष निकालना सवालों के घेरे में है। आदिवासी अस्मिता कोई राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि बस्तर की साझा सांस्कृतिक विरासत है। जनता को भावनात्मक बहस नहीं, स्पष्ट जवाब चाहिए, जो सबके सामने है।
भ्रामक जानकारी फैलाने वालों के लिए साफ संदेश : तथ्यों की जांच करें
आदिवासी समाज की आस्था, सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक परंपराओं से जुड़े विषयों पर अपुष्ट सूचनाएं फैलाना सामाजिक भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है। सोशल मीडिया पर किसी दस्तावेज, तस्वीर या बयान को साझा करने से पहले उसकी प्रमाणिकता जांचना सभी की जिम्मेदारी है। बस्तर की ऐतिहासिक परंपरा को राजनीतिक बहस का विषय बनाने से पहले उसके वास्तविक स्वरूप और महत्व को समझना जरूरी है।
23 अक्टूबर को सिरहासार भवन में होगा पारंपरिक मुरिया दरबार
उपलब्ध आधिकारिक कार्यक्रम सूची के अनुसार, 23 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे सिरहासार भवन में मुरिया दरबार आयोजित होगा। इसमें सांसद, विधायक, पुजारी, मांझी और अन्य पारंपरिक सेवादारियों की सहभागिता का उल्लेख है। प्रशासन ने भी आयोजन स्थल और नाम को लेकर स्थिति स्पष्ट की है।
अब जरूरत इस बात की है कि बस्तर की इस ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ी हर सूचना प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर जनता तक पहुंचे। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की सहभागिता से जुड़ा यह अवसर बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण मौका है।
बस्तर की विरासत पर चर्चा हो, सवाल भी उठें—लेकिन आदिवासी अस्मिता जैसे संवेदनशील विषय पर हर दावा प्रमाण के साथ सामने आना चाहिए। परंपरा का सम्मान और तथ्यों की शुचिता, दोनों ही लोकतांत्रिक संवाद की बुनियाद हैं।

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