
रायपुर, 1 जुलाई। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के माना एयरपोर्ट के पास स्थित नकटी गांव में 77 मकानों पर चली बुलडोजर कार्रवाई अब केवल अतिक्रमण हटाने का मामला नहीं रह गई है, बल्कि प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गई है। जिस जमीन पर विधायकों की कॉलोनी बनाई जानी है, उस परियोजना का निर्णय वर्ष 2022 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान लिया गया था। इसके बावजूद आज कांग्रेस इस मुद्दे पर सबसे अधिक आक्रामक है, जबकि सत्ता में होने के बावजूद बीजेपी रक्षात्मक दिखाई दे रही है।
77 मकान जमींदोज, प्रधानमंत्री आवास भी नहीं बचे
प्रशासन ने नकटी गांव में सरकारी जमीन पर बने 77 मकानों को ध्वस्त कर दिया। इनमें कच्चे और पक्के दोनों तरह के मकान शामिल थे। सबसे अधिक चर्चा इस बात की हो रही है कि कार्रवाई की जद में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने कुछ मकान भी आ गए, जिससे विपक्ष को सरकार पर हमला करने का बड़ा मुद्दा मिल गया।
विस्थापितों को नया ठिकाना, लेकिन सुविधाओं का इंतजार
प्रभावित परिवारों को नवा रायपुर के सेक्टर-30 स्थित ईडब्ल्यूएस आवासों में शिफ्ट किया गया है। हालांकि लोगों का कहना है कि वहां अभी भी बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। कई परिवारों का आरोप है कि नए घरों में रहने लायक व्यवस्थाएं पूरी नहीं हैं।
फैसला कांग्रेस सरकार का, अमल बीजेपी सरकार में
नकटी में विधायकों की कॉलोनी विकसित करने की योजना वर्ष 2022 में कांग्रेस सरकार के दौरान स्वीकृत हुई थी। 2023 में अतिक्रमण हटाने की तैयारी भी हुई, लेकिन कानूनी अड़चनों और विरोध के कारण कार्रवाई नहीं हो सकी। सत्ता परिवर्तन के बाद बीजेपी सरकार ने इस परियोजना को आगे बढ़ाते हुए इस बार व्यापक प्रशासनिक तैयारी के साथ बुलडोजर कार्रवाई पूरी की।
कांग्रेस हमलावर, बीजेपी बचाव में क्यों ?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विवाद कार्रवाई से ज्यादा उसकी टाइमिंग को लेकर है। बरसात के मौसम में गरीब परिवारों के घर तोड़े जाने की तस्वीरों ने सरकार को असहज स्थिति में ला दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित कांग्रेस के कई नेता मौके पर पहुंचे और सरकार पर गरीब विरोधी रवैया अपनाने का आरोप लगाया।
वहीं बीजेपी के कई नेता इस मुद्दे पर खुलकर आक्रामक रुख अपनाने से बचते नजर आए। स्थानीय विधायक अनुज शर्मा ने विस्थापितों को हर संभव सहायता का भरोसा दिया, जबकि सांसद बृजमोहन अग्रवाल पहले पुनर्वास सुनिश्चित करने की बात कहते रहे। ऐसे में कार्रवाई की टाइमिंग को लेकर सत्ता पक्ष के भीतर भी अलग-अलग राय की चर्चा है।
प्रशासनिक कार्रवाई या राजनीतिक संदेश ?
कांग्रेस इस मुद्दे को आगामी राजनीतिक संघर्ष का बड़ा हथियार बनाने में जुटी है, जबकि बीजेपी इसे सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने की सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बता रही है। लेकिन बरसात के बीच गरीब परिवारों के उजड़ने की तस्वीरों ने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक और मानवीय दोनों दृष्टि से बेहद संवेदनशील बना दिया है।
अंत में…
नकटी विवाद आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में और गर्माहट ला सकता है। यदि विस्थापितों के पुनर्वास और मूलभूत सुविधाओं का जल्द समाधान नहीं हुआ, तो यह मुद्दा सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब फैसला कांग्रेस सरकार ने लिया था, तब आज इस मुद्दे पर राजनीतिक बढ़त आखिर किसके हाथ में जाएगी ?

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