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जनसांख्यिकी समिति और हिंदुत्व की व्यापक परियोजना

(मूल आलेख: मुरलीधरन | अंग्रेजी से अनुवाद: संजय पराते)

केंद्र सरकार ने हाल ही में एक उच्च-स्तरीय समिति (HLC) के गठन की घोषणा की है। इस समिति का आधिकारिक उद्देश्य कथित तौर पर अवैध प्रवासन और असामान्य बसावट के कारण होने वाले “अस्वाभाविक” जनसांख्यिकीय बदलावों की जांच करना है।

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प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, यह समिति धार्मिक और सामाजिक समुदायों के स्तर पर आबादी में होने वाले बदलावों के पैटर्न का विश्लेषण करेगी और एक समय-सीमा के भीतर इसका समाधान पेश करेगी।

जल्दबाजी में गठन और समिति की विशेषज्ञता पर सवाल

जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नवलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली इस पांच सदस्यीय समिति को एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। इस कदम पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं:

जनगणना का इंतजार क्यों नहीं?: सरकार ने आधिकारिक जनगणना (Census) के आंकड़ों का इंतजार किए बिना ही इस समिति का गठन कर दिया।

विशेषज्ञता की कमी: समिति के सदस्यों का जनसांख्यिकी (Demography) से कोई सीधा संबंध नहीं है। खुद चेयरमैन जस्टिस नवलेकर ने स्वीकार किया कि जनसांख्यिकी और अवैध प्रवास उनके लिए बिल्कुल नए विषय हैं।

आंकड़ों की हकीकत बनाम जनसांख्यिकीय डर

आलेख के अनुसार, ‘आबादी के असंतुलन’ का यह डर राजनीतिक है, क्योंकि वास्तविक आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में सभी धार्मिक समुदायों में प्रजनन दर (Fertility Rate) लगातार कम हो रही है:

घटता अंतर: 1992 में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच प्रजनन दर का अंतर 1.1 था, जो 2019–21 में घटकर सिर्फ 0.42 रह गया है।

तेजी से गिरावट: 1992-93 के बाद से मुस्लिमों में प्रजनन दर 46.5% कम हुई है, जबकि हिंदुओं में यह गिरावट 41.2% रही है। यानी मुस्लिमों में प्रजनन दर अधिक तेजी से गिर रही है।

जनसांख्यिकीय डर की राजनीति के तीन मुख्य उद्देश्य

लेखक के अनुसार, जनसांख्यिकी से जुड़े डर की यह राजनीति एक साथ कई राजनीतिक मकसद पूरे करती है:

आंतरिक दुश्मन का निर्माण: बेरोजगारी, कॉरपोरेट के हाथों में संपत्ति के संकेंद्रण और शासन की विफलताओं जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाकर लोगों को यह यकीन दिलाना कि देश की मुख्य समस्या घुसपैठिए हैं।

हिंदू पहचान का एकीकरण: हिंदू समाज के भीतर मौजूद जातिगत अंतर्विरोधों, उत्पीड़न और वर्गीय शोषण को दबाकर एक बाहरी खतरे के नाम पर एकजुट राजनीतिक पहचान बनाना।

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सरकारी निगरानी का विस्तार: नागरिकता की जांच, सीमा पर पुलिसिंग, आंकड़े इकट्ठा करना और कड़े कानूनों को देश की सुरक्षा के नाम पर सही ठहराना, जिसका सबसे ज्यादा असर गरीब, प्रवासी और भूमिहीन लोगों पर पड़ता है।

ऐतिहासिक समानताएं: नाजी जर्मनी और न्यूरेम्बर्ग कानून

आलेख में अमेरिकी इतिहासकार विलियम शिरेर की किताब ‘ can द राइज़ एंड फ़ॉल ऑफ़ द थर्ड राइख़’ का हवाला देते हुए नाजी जर्मनी से इसकी तुलना की गई है:

प्रचार और डर की राजनीति: एडॉल्फ हिटलर ने भी तर्क दिया था कि जर्मनी को यहूदियों से जनसांख्यिकीय खतरा है। आर्थिक तंगी और राजनीतिक अस्थिरता का रुख अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत में बदल दिया गया।

नागरिकता की नई परिभाषा: 1935 के न्यूरेम्बर्ग कानूनों के तहत यहूदियों से नागरिकता छीन ली गई और उन्हें सरकारी नौकरियों, पत्रकारिता, शिक्षण और व्यापार से पूरी तरह बाहर कर दिया गया।

हिंदुत्व का वैचारिक ब्लूप्रिंट और गोलवलकर के विचार

यह सोच हिंदुत्व के प्रमुख विचारक एम.एस. गोलवलकर की शिक्षाओं से मेल खाती है। उन्होंने अपनी 1939 की पुस्तक ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ में हिटलर के कदमों का उल्लेख करते हुए लिखा था:

“अपनी नस्ल और संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए, जर्मनी ने सेमिटिक नस्लों — यहूदियों — को देश से बाहर निकालकर दुनिया को चौंका दिया… यह हिंदुस्तान के लिए एक अच्छा सबक है, जिससे हमें सीखना चाहिए और फ़ायदा उठाना चाहिए।”

गोलवलकर ने आगे तर्क दिया था कि हिंदुस्तान में रहने वाली विदेशी जातियों को या तो हिंदू संस्कृति को अपनाना होगा और उसमें विलीन होना होगा, या फिर बिना किसी नागरिक अधिकार और विशेषाधिकार के पूरी तरह हिंदू राष्ट्र के अधीन होकर रहना होगा।

निष्कर्ष

आलेख का निष्कर्ष है कि इस उच्च-स्तरीय जनसांख्यिकीय समिति का गठन हिंदुत्व की इसी दीर्घकालिक परियोजना को आगे बढ़ाने का एक माध्यम है, जिसका उद्देश्य बहुसंख्यकवादी नज़रिए से नागरिकता की परिभाषा को बदलना है। इसके जरिए नागरिकों को केवल जनसांख्यिकीय विषयों (Demographic Subjects) में बदल दिया जाएगा, जिनकी वैधता पहचान पत्रों और राजनीतिक अनुकूलता पर टिकी होगी।

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प्रखर भूमि

प्रखरभूमि एक RNI में पंजीकृत साप्ताहिक समाचार पत्र है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2013 में हुई। अब इसका डिजिटल संस्करण भी इस वेबसाइट के माध्यम से पाठकों तक उपलब्ध है, जहां छत्तीसगढ़ सहित देश-दुनिया की महत्वपूर्ण और विश्वसनीय खबरें प्रकाशित की जाती हैं।

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