पीएम आवास योजना में लाखों का सिस्टमेटिक मिसयूज़ कागज़ों में मकान ज़मीन पर शौचालय जिम्मेदारों की जांच कब?

योजना की साख पर दाग: अधिकारी और इंजीनियर की भूमिका संदिग्ध

बिलासपुर / कोटा जनपद पंचायत में आवास बने शौचालय, स्थानीय से लेकर जनपद स्तर के अधिकारी तक सवालों के घेरे में प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) गरीब, बेघर और कमजोर आय वर्ग के परिवारों को सुरक्षित एवं मानक आवास उपलब्ध कराने की महत्वाकांक्षी योजना है। लेकिन कोटा जनपद पंचायत के अंतर्गत ग्राम पंचायत खैरा में सामने आया मामला इस योजना की पारदर्शिता, निगरानी, फील्ड निरीक्षण, प्रशासनिक गंभीरता और जवाबदेही पर कई बड़े सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों व प्राप्त सूचनाओं के अनुसार तीन लाभार्थियों को स्वीकृत आवास का निर्माण मानक आवास के रूप में न होकर शौचालय व छोटे कमरे के रूप में कर दिया गया, जिससे संदेह उत्पन्न होता है कि कहीं यह पूरा प्रकरण योजनाबद्ध तरीके से किए गए भ्रष्टाचार, मिलीभगत और फर्जीवाड़े का हिस्सा तो नहीं?

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एक ही आवास की दो-दो बार जियो-टैक — फॉर्मेलिटी या सेटिंग?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक आवास की जियो-टैक रिपोर्ट दो बार तैयार की गई, जबकि सामान्य प्रक्रिया में यह तभी किया जाता है जब निर्माण पूर्णतः योजना के अनुरूप हो। यह प्रश्न उठता है कि यदि निर्माण शौचालय के रूप में हुआ, तो फील्ड वेरिफिकेशन किसने किया? क्या जियो-टैक केवल ऑन पेपर पूरी कर ली गई या फिर इसमें फील्डस्टाफ, आवास मित्र, तकनीकी सहायक, जनपद निरीक्षण प्रकोष्ठ और इंजीनियर स्तर पर कोई मिलीभगत हुई?

लाभार्थी का स्वीकार — ‘आवास की राशि से शौचालय और एक कमरा बनाया’
राम मदन जायसवाल के पुत्र कान्हा जायसवाल ने स्वयं स्वीकार किया कि उनके खाते में आए आवास की राशि से शौचालय और पास में एक कमरा तैयार किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि निर्माण का उद्देश्य, डिजाइन, सामग्री, मापदंड और अनुमोदित लेआउट पूरी तरह बदला गया, जो सीधे–सीधे योजना दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। सवाल यह भी उठता है कि ग्रामीण स्वयं मजबूरी में ऐसा कर रहे थे या फिर उन्हें ऐसा करने के लिए ‘गाइड’ किया गया था’?

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तकनीकी फेक की सफाई — जिम्मेदारी मुझ पर नहीं, आवास मित्र पर
संबंधित तकनीकी फेक धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी और उन्होंने आवास मित्र को स्पष्ट कहा था कि उनकी अनुमति के बिना जियो-टैक नहीं होना चाहिए। यदि यह सच है, तो फिर वह जियो-टैक किसने और किसके आदेश पर किया? यह बयान स्वयं में ही अस्पष्ट है, क्योंकि इंजीनियर निर्माण व मानक निरीक्षण के तकनीकी प्रभारी अधिकारी होते हैं। ऐसे में अनभिज्ञता का दावा स्वयं जिम्मेदारी से बचने जैसा प्रतीत होता है।

अब सवाल अधिकारी और जनपद प्रशासन पर भी
गंभीर प्रश्न यह है कि जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO), निर्माण निरीक्षण शाखा, लेखा शाखा, MIS रिपोर्टिंग अधिकारी, पंचायत सचिव, तथा निगरानी विभाग की जिम्मेदारी कहाँ जाती है?

यदि इतना बड़ा मामला स्थानीय स्तर पर चर्चा में था, तो
1️⃣ जनपद स्तर से निर्माण की मॉनिटरिंग रिपोर्ट क्यों जारी नहीं हुई?
2️⃣ लाभार्थियों व संबंधित स्टाफ को नोटिस क्यों नहीं मिला?
3️⃣ रिकवरी, निलंबन या जांच आदेश क्यों लंबित है?
4️⃣ क्या उच्चाधिकारियों को जमीनी हकीकत छुपाई गई या उन्हें जानकारी होने पर भी चुप्पी साधी गई?

ग्रामीणों की मांग — उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच, रिकवरी और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई
ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा है कि यह मामला लापरवाही नहीं, बल्कि योजनाबद्ध आर्थिक अनियमितता जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने मांग की है कि जिला प्रशासन, ZP CEO या कलेक्टर द्वारा जांच दल गठित कर जवाबदेही तय की जाए, ताकि आगे ऐसी घटनाएँ न हों और योजनाओं की साख बनी रहे।

अब पूरा क्षेत्र एक ही सवाल पूछ रहा है —
क्या यह मामला कार्रवाई तक पहुँचेगा, या फिर फाइलों में धूल खाकर किसी और घोटाले का हिस्सा बन जाएगा?

आवास बने शौचालय पर क्या कहते हैँ  जिला प्रशासन, ZP CEO, SDM, JP CEO [ पार्ट 3 ]

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