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अमरीका – ईरान युद्ध से भारत में बढ़ सकती है मंहगाई, आइए, यहां जानिए विस्तार से

नईदिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर सिर्फ उस इलाके तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलता है. इजरायल और अमेरिका के हमलों के बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई से हालात और गंभीर हो गए हैं.

इस कार्रवाई में ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद लगातार स्थितियां बिगड़ रही हैं. ऐसे में भारत के लिए यह समझना जरूरी है कि वह ईरान से क्या-क्या आयात करता है और जंग की स्थिति में किन चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं.

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भारत के लिए ईरान क्यों अहम है?

भारत और ईरान के रिश्ते पुराने हैं. 1950 में दोनों देशों ने औपचारिक राजनयिक संबंध बनाए थे. 1970 के दशक के बाद व्यापारिक रिश्ते और मजबूत हुए. अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद दोनों देशों ने कई बार वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था अपनाई, जिसमें रुपया-रियाल तंत्र भी शामिल रहा.

ईरान भारत के लिए ऊर्जा, समुद्री व्यापार मार्ग और मध्य एशिया तक पहुंच के लिहाज से अहम देश है. इसी वजह से भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में निवेश किया है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सामान पहुंचाने का एक रणनीतिक रास्ता है.

भारत ईरान से क्या-क्या आयात करता है?

कच्चा तेल
ईरान कभी भारत के लिए प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है. अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद आयात में कमी आई, लेकिन वैश्विक बाजार में ईरान से सप्लाई बाधित होने पर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें बढ़ सकती हैं. इसका सीधा असर भारत के पेट्रोल और डीजल दामों पर पड़ता है.

पेट्रोकेमिकल और केमिकल उत्पाद
भारत ईरान से कुछ खास पेट्रोकेमिकल्स और औद्योगिक केमिकल्स भी मंगाता है. इनका इस्तेमाल प्लास्टिक, उर्वरक, दवा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में होता है. सप्लाई रुकने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है.

सूखे मेवे और फल
ईरान से पिस्ता, खजूर, केसर और कुछ अन्य सूखे मेवे भारत आते हैं. इसके अलावा सेब और कीवी जैसे फल भी आयात होते हैं. जंग की वजह से सप्लाई चेन बाधित होने पर इनकी कीमतें बढ़ सकती हैं.

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कांच और अन्य औद्योगिक सामान
कुछ खास ग्लासवेयर और औद्योगिक उत्पाद भी ईरान से भारत आते हैं. इनका असर सीमित हो सकता है, लेकिन कीमतों में बढ़ोतरी से छोटे उद्योग प्रभावित हो सकते हैं.

तेल सप्लाई और होर्मुज स्ट्रेट का खतरा

भारत की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से जुड़ा है. होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है. भारत के कुल कच्चे तेल आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है. विश्लेषकों के मुताबिक, अगर इस समुद्री मार्ग में रुकावट आती है तो भारत के कुल मासिक आयात का करीब 50% तक प्रभावित हो सकता है. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होगा और भारत का आयात बिल बढ़ेगा.

शिपिंग और बीमा लागत में बढ़ोतरी

मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से रेड सी कॉरिडोर और आसपास के समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ जाता है. जहाजों का बीमा महंगा हो जाता है और माल ढुलाई की लागत बढ़ती है. इसका असर सिर्फ तेल पर नहीं, बल्कि बाकी आयात-निर्यात पर भी पड़ता है. लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ने से भारत के एक्सपोर्ट महंगे हो सकते हैं, जिससे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है.

आम लोगों पर सीधा असर

अगर तनाव लंबा खिंचता है तो इसका असर पेट्रोल और डीजल के दाम, रसोई गैस, हवाई किराया, ट्रांसपोर्ट लागत, खाद्य तेल और पैकेज्ड सामान, सूखे मेवे और आयातित फल पर देखने को मिल सकता है. ऊर्जा महंगी होने से लगभग हर सेक्टर की लागत बढ़ती है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है.

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