छत्तीसगढ़

वात्सल्य कक्ष : एक संवेदनशील प्रशासनिक पहल

जिला कार्यालय में एक ऐसा कोना, जहां महिलाएं सिर्फ कर्मचारी ही नहीं, एक बच्चे की मां भी हैं

 

बिलासपुर (ग्रामयात्रा छत्तीसगढ़ )।  बिलासपुर कलेक्टोरेट का जब सुबह 10 बजे दरवाजा खुलता है तब सैकड़ों कर्मचारियों के साथ 55 से अधिक महिलाएं भी कार्यालय में आती है। इस समय कुछ महिलाएं अकेली नहीं होती उनकी गोद में नन्हे बच्चों के रूप में एक और जिम्मेदारी होती है। जिला प्रशासन ने इन माताओं की जिम्मेदारी को समझा।

 

इनकी भावनाओं को समझते हुए कलेक्ट्रेट में एक ऐसा कोना तैयार किया है जो सिर्फ महिलाओं और उनके बच्चों के लिए समर्पित है। जहां बच्चे मुस्कुराते है, महिलाएं सुकून से बैठती है और मातृत्व को एक गरिमामयी स्थान मिला है, इसे वात्सल्य कक्ष का नाम दिया गया है।

यह सिर्फ ईंट पत्थर से बना एक कमरा नहीं, यह मातृत्व का सम्मान है। एक ऐसा प्रयास जो बताता है कि महिला कर्मचारी सिर्फ कामकाजी महिला भर नहीं हैं, वो एक नन्हें बच्चे की मां भी होती है और उस भूमिका के लिए भी दफ्तर में जगह होनी चाहिए। कार्यालय में बहुत सी महिलाएं कार्यरत हैं, जिनमें कई शिशुवती माताएं भी है। उनके लिए दिन के 8-10 घंटे बच्चे से दूर रहना केवल पेशेवर जिम्मेदारी नहीं बल्कि भावनात्मक संघर्ष भी होता है।

इसी संघर्ष को समझते हुए जिला प्रशासन ने 8 मार्च 2025 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर वात्सल्य कक्ष का लोकार्पण किया। एक ऐसी जगह जहां कार्यरत महिलाएं अपने बच्चों को सुरक्षित और स्नेहिल माहौल में रख सकती है। महिलाएं आवश्यकता पड़ने पर भोजन के दौरान बच्चों को खाना खिला सकती है।

 

कुछ देर आराम कर सकती है। घर और कार्यालय के काम को भी संभालती महिलाओं को समाज की मुख्य धारा में जोड़ने की ये जिला प्रशासन की पहल बहुत ही सराहनीय है। इस वात्सल्य कक्ष में बच्चों की देखरेख आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आशा यादव और सहायिका चमेली यादव करती है। यहां बच्चों के खेलने के लिए खिलौने, टीव्ही और शैक्षणिक चित्रकारी, आरामदायक फर्नीचर, एसी और पिंक टॉयलेट की सुविधा है। इसमें महिलाओं और बच्चों को देखते हुए सभी व्यवस्थाएं की गई है। इसका निर्माण जिला प्रशासन द्वारा डीएमएफ मद के प्रावधान अनुसार सक्षम समिति/शासी परिषद द्वारा अनुमोदन उपरांत किया गया है।

महिलाओं की आंखों में दिखता है सुकून –

कलेक्टोरेट में कार्यरत श्रीमती जूही सोम ने बताया कि यह पहल हमें एहसास दिलाती है कि हमारे मातृत्व को सम्मान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह हमारा कोना है, जहां हम अपने बच्चों को रखकर सुरक्षित महसूस करते है। उन्होंने बताया कि एक कामकाजी महिला के लिए नौकरी और बच्चों की परवरिश एक साथ करना चुनौती होती है।

हमारी बरसों पुरानी मांग अब पूरी हुई है। पहले हमें या तो अवकाश लेना पड़ता था या बच्चों को कई और छोड़कर आना होता था जिससे हम अपने काम पर भी फोकस नहीं कर पाते थे। अब हम निश्चिंत होकर काम कर पाते है। इसी प्रकार  रजनी तिवारी ने मुख्यमंत्रीविष्णुदेव साय और जिला प्रशासन को धन्यवाद देते हुए कहा कि यह पहल उनकी दैनिक चुनौतियों को समझने और उन्हें हल करने की दिशा में मिल का पत्थर साबित हुआ है। अब हम काम पर भी ध्यान दे पा रहे हैं और बच्चों को लेकर निश्चिंत भी है।

मां के बनने बाद महिलाओं को बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है किंतु इस वात्सल्य कक्ष में हमें हमारी दो दुनियाओं के बीच संतुलन दे दिया है।

 

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