कोरबा वनमंडल में भ्रष्टाचार का ‘टॉवर’: कुदमुरा रेंज में वॉच टॉवर अधूरा, लेकिन रेंजर-एसडीओ ने निकाल लिया पूरा पैसा!

कोरबा। कोरबा वनमंडल में इन दिनों विकास कार्य सिर्फ कागजों और अफसरों की जेबों तक सीमित होकर रह गए हैं। भ्रष्टाचार और लापरवाही का एक नया और सनसनीखेज मामला कुदमुरा वन परिक्षेत्र से सामने आया है। यहां रेगुलर फंड के 22 लाख रुपए की लागत से बनने वाला वॉच टॉवर आज भी आधा-अधूरा ढांचा बनकर खड़ा है, लेकिन वन विभाग के अफसरों ने वित्तीय वर्ष की समाप्ति (मार्च) से पहले ही इसका पूरा पैसा डकार लिया है।

इस पूरे मामले में एसडीओ (दक्षिण) से लेकर रेंजर, डिप्टी रेंजर और बीटगार्ड की आपसी मिलीभगत और “खाया-पिया-पचाया” वाले रवैये की चर्चा जोरों पर है।

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मार्च में पूरा होना था काम, जून खत्म होने को है पर निर्माण का अता-पता नहीं

लागत: लगभग 22 लाख रुपए (रेगुलर फंड)

लोकेशन: कुदमुरा वन परिक्षेत्र के गितकुंवारी।

समय सीमा: मार्च माह तक निर्माण कार्य शत-प्रतिशत पूर्ण होना था।

ग्राउंड रिपोर्ट:

वित्तीय वर्ष खत्म होने से पहले ही अधिकारियों ने कागजों पर काम को पूरा दिखाकर पूरी राशि का आहरण (Withdrawal) कर लिया। लेकिन हकीकत यह है कि जून का महीना खत्म होने को है और ग्राउंड पर यह टॉवर सिर्फ एक लोहे-सीमेंट का अधूरा कंकाल नजर आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, निर्माण स्थल पर दूर-दूर तक न तो कोई निर्माण सामग्री (रेत, गिट्टी, सीमेंट) मौजूद है और न ही कोई मजदूर काम कर रहा है।

अधिकारियों का मौन: पूछने पर झाड़ लेते हैं पल्ला

जब हमारे समाचार सहयोगी ने इस अधूरे निर्माण को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा, तो विभाग में ‘पल्ला झाड़ने’ का खेल शुरू हो गया:

डिप्टी रेंजर (सनत कुमार): इन्होंने सीधे शब्दों में कह दिया कि “इस बारे में जो भी जानकारी चाहिए, रेंजर साहब से मांगिए।”

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कुदमुरा रेंजर (जी.एस. पैकरा): जब मामले की सच्चाई जानने के लिए रेंजर पैकरा को फोन किया गया, तो उन्होंने फोन उठाना ही मुनासिब नहीं समझा।

एसडीओ (दक्षिण), जिनकी निगरानी में यह पूरा काम हो रहा है, वे भी अपने मातहतों (जूनियर अधिकारियों) को पूरी तरह संरक्षण दिए हुए हैं।

भुलसीडीह का घाव अभी भरा नहीं, दूसरा कारनामा सामने आया

यह पहली बार नहीं है जब कोरबा वनमंडल में ऐसा घोटाला हुआ है। इससे पहले भुलसीडीह में घटिया निर्माण के कारण एक बड़ा हादसा हुआ था। वहां भी एक वॉच टॉवर के गुणवत्ताहीन निर्माण के कारण एक मजदूर राकेश खड़िया की जान जाते-जाते बची। वह गंभीर रूप से घायल हुआ और जीवन भर के लिए भारी काम करने के अयोग्य हो गया।

मुख्य नियोजक रेंजर मृत्युंजय शर्मा ने उस गरीब मजदूर को उसके हाल पर छोड़ दिया और इस गंभीर मामले में आज तक एसडीओ या रेंजर के खिलाफ कोई जांच या कार्रवाई नहीं हुई।

करोड़ों-अरबों का हो रहा वारा-न्यारा

वन विभाग के इन गैर-जिम्मेदार अधिकारियों के कारण शासन का खजाना लगातार खाली हो रहा है। धरातल पर काम या तो नजर नहीं आते, और यदि नजर आते हैं तो इतने घटिया होते हैं कि कुछ ही दिनों में टूट जाते हैं। इसके बाद अफसर दोबारा पुनर्निर्माण के नाम पर नया बजट पास कराकर अपनी जेबें भरते हैं। अब देखना यह है कि इस खबर के उजागर होने के बाद वन विभाग का उच्च प्रबंधन नींद से जागता है या भ्रष्टाचार का यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा।

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