सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि न्यायालय में केस लंबित होने के बावजूद तहसील कार्यालय ने उस जमीन का नामांतरण शुरू कर दिया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि तहसीलदार ने बिना न्यायिक निर्णय का इंतजार किए, रजिस्ट्री को वैध मानते हुए नामांतरण की प्रक्रिया तेज़ कर दी।
रजेशवर तिवारी
जांजगीर–चांपा, छत्तीसगढ़ – जिले की शिवरीनारायण तहसील में इन दिनों प्रशासनिक तानाशाही और न्यायिक प्रक्रिया की खुलेआम धज्जियां उड़ने की खबरें सामने आ रही हैं। तहसीलदार पर बेहद गंभीर आरोप लगे हैं, जिनमें फर्जी दस्तावेजों को वैध ठहराना, न्यायालय में लंबित मामले की अनदेखी कर भूमि का नामांतरण करना और एकतरफा निर्णय लेना शामिल है।

इस प्रकरण को लेकर शिकायतकर्ता दिनेश कुमार दुबे ने कलेक्टर कार्यालय में एक विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए तहसीलदार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि यह पूरा मामला प्रशासनिक मिलीभगत का है, जिसमें अधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कानून की अनदेखी की जा रही है।
???? जमीन का खेल: खसरा नंबर बदलकर फर्जी बिक्री!
मामला खसरा नंबर 538/3 की भूमि का है। शिकायतकर्ता के अनुसार, इस ज़मीन को हड़पने की नीयत से फर्जीवाड़ा कर 538/1 में परिवर्तित किया गया और फिर एक कूटरचित विक्रय पत्र (फर्जी रजिस्ट्री) तैयार किया गया। इस दस्तावेज़ के आधार पर भूमि को किसी तीसरे पक्ष को बेच दिया गया।
दिनेश दुबे ने जब इस धोखाधड़ी की भनक पाई, तो उन्होंने मामले को लेकर चतुर्थ सिविल न्यायालय, जांजगीर में एक वाद दायर किया। फिलहाल यह वाद न्यायालय में विचाराधीन है।
⚠️ न्यायालय का अपमान? विवादित भूमि का नामांतरण शुरू!
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि न्यायालय में केस लंबित होने के बावजूद तहसील कार्यालय ने उस जमीन का नामांतरण शुरू कर दिया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि तहसीलदार ने बिना न्यायिक निर्णय का इंतजार किए, रजिस्ट्री को वैध मानते हुए नामांतरण की प्रक्रिया तेज़ कर दी।
यह कार्रवाई सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना और राजस्व संहिता के नियमों का उल्लंघन मानी जा रही है।
???? तहसीलदार पर मिलीभगत का आरोप – कानून को बनाया जेब का रुमाल?
दिनेश दुबे का दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम में तहसीलदार की सक्रिय भूमिका है। उनका आरोप है कि तहसील कार्यालय जानबूझकर फर्जी दस्तावेजों को संरक्षण दे रहा है और व्यक्तिगत हितों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय की अनदेखी की जा रही है।
उन्होंने कहा कि तहसीलदार एवं कुछ अन्य अधिकारी मिलकर “सिस्टम” को मोहरा बना रहे हैं, ताकि असली जमीन मालिक को दरकिनार कर गलत तरीके से नामांतरण की अनुमति दी जा सके।
???? शिकायतकर्ता का बयान:
“मैंने न्यायालय में वाद प्रस्तुत किया है। जब मामला कोर्ट में है, तब तहसीलदार और उनके सहयोगी मनमानी कर रहे हैं। न्याय का घोर उल्लंघन हो रहा है। कलेक्टर से मांग करता हूँ कि इस प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाई जाए और तहसीलदार के खिलाफ निष्पक्ष जांच हो।“
– दिनेश कुमार दुबे, शिकायतकर्ता
???? अब उठ रहे हैं सवाल – क्या शिवरीनारायण में प्रशासन बेलगाम हो चुका है?
- ✅ क्या तहसीलदार ने जानबूझकर न्यायालय की अवमानना की?
- ✅ किस आधार पर विवादित जमीन का नामांतरण किया गया?
- ✅ क्या तहसील कार्यालय फर्जी दस्तावेजों को वैध बना रहा है?
- ✅ प्रशासन में बैठे कुछ लोग किसके इशारे पर काम कर रहे हैं?
- ✅ कब होगी इस “सिस्टमिक मिलीभगत” पर निष्पक्ष कार्रवाई?
???? शिकायतकर्ता की मांगें:
✋ जब तक मामला न्यायालय में विचाराधीन है, तब तक नामांतरण पर रोक लगाई जाए।
???? तहसीलदार एवं संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की जाए।
⚖️ राजस्व विभाग द्वारा स्वतंत्र जांच टीम गठित की जाए।
???? फर्जी दस्तावेजों को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।
???? क्या कहती है जनता?
स्थानीय ग्रामीणों और भूमि विवादों के जानकारों का कहना है कि यदि इस तरह न्यायिक प्रक्रिया की अनदेखी होती रही, तो किसी की भी संपत्ति कूटरचना से छिनी जा सकती है। लोगों में आक्रोश है और वे प्रशासन से जवाब चाहते हैं।
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यह मामला केवल एक ज़मीन विवाद नहीं, बल्कि पूरे राजस्व प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान है। तहसीलदार की भूमिका की निष्पक्ष जांच न होने पर जनता का प्रशासन से विश्वास उठ सकता है। अब देखना यह है कि कलेक्टर क्या कड़ा कदम उठाते हैं, या यह शिकायत भी बाकी हजारों फाइलों की तरह धूल फांकती रहेगी?

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