हिंसा का चेहरा: सरेंडर रोकने वाला माओवादी नेता प्रभाकर मुठभेड़ में मारा गया, माओवादी हिंसा बनाम आदिवासी हित

दंडकारण्य के जंगलों में मारा गया माओवादी नेता प्रभाकर उर्फ़ स्वामी उर्फ़ चंदर एक बार फिर उस पुराने सवाल को सामने ले आता है कि क्या माओवादी आंदोलन वास्तव में आदिवासियों के हक़ की लड़ाई है, या फिर उन्हीं के कंधों पर बंदूक रखकर चलाई जा रही हिंसा की राजनीति?

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सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक प्रभाकर माओवादी संगठन का वरिष्ठ रणनीतिकार था। उस पर सुरक्षा बलों के जवानों और अनेक ग़रीब आदिवासियों की हत्या में शामिल होने के आरोप थे। इसके बावजूद माओवादी संगठन उसे ‘शहीद’ और ‘जननायक’ बताने में जुटा है। यह वही पैटर्न है, जिसमें हर मुठभेड़ के बाद संगठन अपनी हिंसा को वैचारिक आवरण देने की कोशिश करता है।

आदिवासी: जिनके नाम पर, उन्हीं के ख़िलाफ़

माओवादी नेतृत्व का दावा हमेशा से आदिवासियों के हक़ की लड़ाई का रहा है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे उलट है। पुलिस रिकॉर्ड और कई स्वतंत्र रिपोर्टें बताती हैं कि प्रभाकर जैसे नेता आदिवासियों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते थे।
जो ग्रामीण माओवादी लाइन से सहमत नहीं हुए, उन्हें पुलिस मुखबिर बताकर प्रताड़ित किया गया। कई निर्दोष लोग इसी डर और हिंसा का शिकार बने।

सरेंडर से जबरन रोकना: एक अनकही सच्चाई

सरकार की पुनर्वास नीतियों के बावजूद बड़ी संख्या में माओवादी कैडर आत्मसमर्पण करना चाहते थे। लेकिन प्रभाकर जैसे नेता सरेंडर को ‘ग़द्दारी’ बताकर जबरन रोकते रहे। युवाओं को धमकाया गया, मानसिक दबाव डाला गया और कई मामलों में संगठनात्मक सज़ा दी गई। नतीजा यह हुआ कि जिन लोगों को मुख्यधारा में लौटने का मौका मिल सकता था, वे अब भी जंगलों में हिंसा और मौत के चक्र में फँसे हुए हैं।

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हिंसा का महिमामंडन और विचारधारा की विफलता

प्रभाकर की मौत के बाद माओवादी संगठन का प्रचार तंत्र जिस तरह से उसे ‘हीरो’ बना रहा है, वह दरअसल अपनी वैचारिक विफलता को छिपाने की कोशिश है। अगर आंदोलन सच में जनसमर्थन पर टिका होता, तो बंदूक के ज़ोर पर लोगों को रोकने, डराने और मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

सुरक्षा बलों की कार्रवाई और आगे की चुनौती

प्रभाकर का मारा जाना सुरक्षा बलों के लिए रणनीतिक सफलता है, लेकिन यह लड़ाई यहीं खत्म नहीं होती। असली चुनौती यह है कि आदिवासी इलाक़ों में विकास की गति बढ़े, सरेंडर करने वालों को भरोसेमंद पुनर्वास मिले और माओवादी नैरेटिव के झूठ को तथ्यों के साथ लगातार बेनक़ाब किया जाए

प्रभाकर की कहानी किसी ‘क्रांतिकारी’ की नहीं, बल्कि हिंसा के उस मॉडल की है जो अपने ही दावों को झुठलाता है। आदिवासियों के नाम पर लड़ी जा रही यह लड़ाई, असल में आदिवासियों और देश, दोनों के ख़िलाफ़ खड़ी नज़र आती है।

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